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भोलाराम का जीव Lesson-4/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi

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नमस्कार सभी को, अगर आप क्लास १० हिंदी किताब के लेसन को ऑनलाइन पढ़ना चाहते है, तोह ये आर्टिकल आपके लिए हैं।

Class 10 Hindi Textbook-आलोक के Lesson-4 भोलाराम का जीव को यहाँ पर ऑनलाइन पढ़ पाएंगे।

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हरिशंकर परसाई
(1922-1995)



आधुनिक हिंदी व्यंग्यात्मक साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक हरिशंकर परसाई जी का जन्म सन् 1922 में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित जमानी नामक गाँव में हुआ। 

इनकी आरंभिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे नागपुर आए और नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद आपने अध्यापन कार्य शुरू किया। 

पर, सन् 1947 से आप स्वतंत्र लेखन कार्य से जुड़ गए। कुछ समय तक उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काम किया। आपने जबलपुर से 'वसुधा' नामक पत्रिका भी निकाली। सन् 1995 में आप दिवंगत हो गए।

परसाई जी ने साहित्य की कई विधाओं में प्रचुर रचनाएँ की हैं। परंतु हिंदी साहित्य जगत में वे व्यंग्य लेखक के रूप में अधिक विख्यात हुए। 

उनकी रचनाओं में रानी नागफनी की कहानी और तट की खोज (उपन्यास), हँसते हैं रोते हैं और जैसे उनके दिन फिरे (कहानी संग्रह), भूत के पाँव पीछे, सदाचार की ताबीज, बेईमानी की परत, पगडंडियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, (निबंध संग्रह), ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर और तिरछी रेखाएँ (व्यंग्य संग्रह) आदि प्रमुख हैं। 
'परसाई रचनावली' छह भागों में प्रकाशित हो चुके हैं।

परसाई जी के निबंधों के विषय मौलिक, सामयिक एवं आकार में लघु तथा अछूते विषयों को अपने आप में समेटे हुए हैं । 

जहाँ एक ओर उन्होंने व्यंग्य रचनाओं में समाज में फैले पाखण्ड, भ्रष्टाचार, शोषण, बेईमानी जैसी कुरीतियों का पर्दाफाश किया है, वहीं दूसरी ओर तिलमिलाहट पैदा करने वाली एक अजीब शक्ति भी है। इनके व्यंग्य सटीक एवं प्रभावशाली होते हैं। 

आम आदमी की बोलचाल की भाषा होने तथा बीच-बीच में अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग से आपकी रचनाएँ बेहद रोचक बन पड़ी हैं।

'भोलाराम का जीव' नामक कहानी में हरिशंकर परसाई ने पौराणिक युग के परिपेक्ष्य में आधुनिक समाज व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार को मार्मिकता के साथ पेश किया है। 

यह भ्रष्टाचार लगभग हर सरकारी विभाग में व्याप्त है तथा इससे समाज का हर वर्ग प्रभावित है। पाँच साल पहले सेवानिवृत्त भोलाराम की परेशानी में आम जनता की परेशानी छिपी हुई है। 

पाँच वर्षों तक पेंशन के लिए कार्यालय का चक्कर लगानेवाले भोलाराम के परिवार की आर्थिक दयनीयता पाठकों को सोचने पर विवश कर देती है। 

कहानी के अंत में नारद के सामने फाइल के पन्नों से भोलाराम की आत्मा की आवाज परिस्थिति की विडम्बना को व्यंग्यात्मक बना देती है।



Class 10 Assamese Textbook(Online Read)




भोलाराम का जीव



ऐसा कभी नहीं हुआ था।
धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग या नर्क में निवास स्थान 'अलॉट' करते आ रहे थे-पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड़ में नहीं आ रही थी। 

आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतने जोर से बंद किया कि मक्खी चपेट में आ गयी। उसे निकालते हुए वह बोले-'महाराज, रिकार्ड सब ठीक है।' 

भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर हाँ अभी यहाँ तक नहीं पहुंचा।'

धर्मराज ने पूछा-'और वह दूत कहाँ है?' 'महाराज, वह भी लापता है।'

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बहुत बदहवास-सा वहाँ आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे-'अरे. त कहाँ रहा

रवाना भी हुआ, पर हाँ अभी यहाँ तक नहीं पहुँचा।'
धर्मराज ने पूछा-'और वह दूत कहाँ है?' 'महाराज, वह भी लापता है।'
इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बहुत बदहवास-सा वहाँ आया। 

उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे-'अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?'

यमदूत हाथ जोड़कर बोला-'दयानिधान! मैं कैसे बतलाऊँ कि क्या हो गया। आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर इस बार भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। 

पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह त्यागी, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की। 

नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ, त्यों ही वह मेरे चंगुल से छूटकर न जाने कहाँ गायब हो गया। इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला।'

धर्मराज क्रोध से बोले-'मूर्ख जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया, फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया।'
दूत ने सिर झुकाकर कहा- 'महाराज, मेरी सावधानी में बिल्कुल कसर नहीं थी। मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके, पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया।'

चित्रगुप्त ने कहा-'महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को फल भेजते हैं और वे रास्ते में ही रेलवेवाले उड़ा लेते हैं। 

हौजरी के पार्सलों के मौजे रेलवे-अफसर पहनते हैं। मालगाड़ी के डिब्बे-के-डिब्बे रास्ते में कट जाते हैं। 

एक बात और हो रही है। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर कहीं बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने, मरने के बाद भी खराबी करने के लिए नहीं उड़ा दिया?'

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा-'तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गयी। भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?'

इसी समय कहीं से घूमते-फिरते नारद मुनि वहाँ आ गये। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले- क्यों धर्मराज, कैसे चिन्तित बैठे हैं? क्या नर्क में निवास स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?'

धर्मराज ने कहा- 'वह समस्या तो कभी की हल हो गयी, मुनिवर! नर्क में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं। 

कई ईमारतों के ठेकेदार हैं, जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनायीं।'

बड़े-बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं, जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर भारत की पंचवर्षीय योजनाओ का पैसा खाया।

ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मजदूरों की हाजिरी भरकर पैसा हड़पा, जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नर्क में कई इमारतें तान दी हैं। 

वह समस्या तो हल हो गई। भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इसने सारे

ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप-पुण्य का भेद ही मिट जाएगा।'
नारद ने पूछा-'उस पर इन्कम टैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।'
चित्रगुप्त ने कहा- 'इन्कम होता तो टैक्स होता!... भुखमरा था!'
नारद बोले- 'मामला बड़ा दिलचस्प हैं। अच्छा, मुझे उसका नाम-पता तो बतलाओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूँ।'

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देखकर बताया-'भोलाराम नाम था उसका, जबलपुर शहर के घमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे के टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था। 

उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की। उम्र लगभग पैंसठ साल सरकरी नौकर था; पाँच साल पहले रिटायर हो गया था। 

मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया था, इसलिए मकान-मालिक उसे निकालना चाहता था। इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया। आज पाँचवाँ दिन है। 

बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक, वास्तविक मकान-मालिक है, तो उसने भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इसलिए आपको परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा।'

माँ-बेटी के सम्मिलित क्रंदन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गए।
द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगाई–'नारायण....नारायण!' लड़की ने देखकर कहा–'आगे जाओ, महाराज।'

नारद ने कहा- 'मुझे भिक्षा नहीं चाहिए। मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी माँ को जरा बाहर भेजो, बेटी।'

भोलाराम की पत्नी बाहर आई। नारद ने कहा-'माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?'

'क्या बताऊँ ? गरीबी की बीमारी था। पाँच साल हो गए, पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे,

पर वहाँ से या तो जवाब ही नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले पर विचार हो रहा है। इन पाँच सालों से मेरे सब गहने बेचकर हमलोग खा गए। 

फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।'

नारद ने कहा-'क्या करोगी, माँ ?..उनकी इतनी ही उम्र थी।'
ऐसा तो मत कहो, महाराज। उम्र तो बहुत थी। 

पचास-साठ रुपया महीना पेंशन मिलती, तो कुछ और काम नहीं करके गुजारा हो जाता। पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गए और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली।' 

दुख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं। वह अपने मुद्दे पर
आए–'माँ, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से क्या उनका विशेष प्रेम था, जिसमें उनका जी लगा हो?'

पत्नी बोली-'लगाव तो महाराज, बाल-बच्चों से ही होता है।' नारद हँसकर बोले-'हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। 

यही भ्रम अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा माता, मैं चला।'

व्यंग्य समझने की असमर्थता ने नारद को सती के क्रोध की ज्वाला से बचा लिया।

स्त्री ने कहा-'महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरुष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाए। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाएगा।'

नारद को दया आ गई थी। वह कहने लगे-'साधुओं की बात कौन मानता है ? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूँगा।'

वहाँ से चलकर नारद सरकारी दफ्तर में पहुँचे। वहाँ पहले ही कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं। 

उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला-'भोलाराम ने दरख्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी।'

नारद ने कहा-'भाई , ये बहुत-से पेपरवेट तो रखे हैं इन्हें क्यों नहीं रख दिया?'

बाबू हँसा-'आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख्वास्तें पेपरवेट से नहीं दबती...खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।'

नारद उस बाबू के पास गए। उसने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास, चौथे ने पाँचवें के पास। जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफसरों के पास घूम आए, तब एक चपरासी ने कहा-'महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए! आप अगर साल-भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा। 
आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया तो अभी काम हो जाएगा।'
नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था, इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। उन्हें एकदम बिना विजटिंग कार्ड के आया देख, साहब बड़े नाराज हुए। 

बोले-'इसे कोई मंदिर-वंदिर समझ लिया क्या?' धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?'
नारद ने कहा-'कैसे भेजता? चपरासी तो सो रहा है! 'क्या काम है ?'- साहब ने रौब से पूछा। नारद ने भोलाराम का पेंशन-केस बतलाया।

साहब बोले-'आप हैं वैरागी; दफ्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते। असल में भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी एक मंदिर है। 

यहाँ भी दानपुण्य करना पड़ता है; भेंट चढ़ानी पड़ती है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं। इन पर वजन रखिए।'

नारद ने सोचा कि फिर वजन की समस्या खड़ी हो गई। साहब बोले'भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेशन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है। 

देर लग ही जाती है। हजारों बार एक ही बात को हजार जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतनी कीमत की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ,जल्दी भी हो सकती है, मगर...' साहब रुके।

नारद ने कहा-'मगर क्या ?'
साहब ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा-'मगर वजन चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा हैं, इसका भी वजन भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है। 

मेरी लड़की गाना-बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूंगा। साधुओं की वीणा तो बड़ी पवित्र होती है। लड़की जल्दी संगीत सीख गई, तो उसकी शादी हो जाएगी।'

नारद अपनी वीणा छिनते देखकर जरा घबराए। पर फिर सँभालकर उन्होंने वीणा टेबल पर रखकर कहा–'यह लीजिए। अब जरा जल्दी उसकी पेंशन का ऑर्डर निकाल दीजिए।'

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई। चपरासी हाजिर हुआ।

साहब ने हुक्म दिया-'बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ!'
थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़ सौ दरख्वास्तों से भरी फाइल लेकर आया। 

उसमें पेंशन के कागजात भी थे। साहब ने फाइल पर का नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा-'क्या नाम बताया, साधुजी, आपने?'

नारद ने समझा कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए जोर से बोल'भोलाराम।'

सहसा फाइल में से आवाज आई-'कौन पुकार रहा है मुझे ? पोस्टमैन है क्या? पेंशन का ऑर्डर आ गया?'

साहब डरकर कुर्सी से लुढ़क गए। नारद भी चौंके। पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए। बोले-'भोलाराम! तुम क्या भोलाराम के जीव हो।'
'हाँ' आवाज आई।
नारद ने कहा- मैं नारद हूँ मैं तुम्हें लेने आया हूँ। चलो स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है।
आवाज आई-'मुझे नहीं जाना। 

मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों में अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता!'



Class 10 Assamese Notes/Solutions





अभ्यासमाला



बोध एवं विचार 

1. सही विकल्प का चयन करो

(क) भोलाराम के जीव ने कितने दिन पहले देह त्यागी थी?
(अ) तीन दिन पहले 
(आ) चार दिन पहले
(इ) पाँच दिन पहले 
(ई) सात दिन पहले 

(ख) नारद भोलाराम का घर पहचान गए -
(अ) माँ-बेटी के सम्मिलित क्रंदन सुनकर 
(आ) उसका टूटा-फूटा मकान देखकर 
(इ) घर के बगल में नाले को देखकर
(ई) लोगों से घर का पता पूछकर 

(ग) धर्मराज के अनुसार नर्क में इमारतें बनाकर रहनेवालों में कौन शामिल हैं?
(अ) ठेकेदार ... 
(आ) इंजीनियर
(इ) ओवरसीयर 
(ई) उपर्युक्त सभी 

(घ) बड़े साहब ने नारद को भोलाराम के दरख्वास्तों पर वजन रहने की सलाह दी। यहाँ 'वजन' का अर्थ है - 
(अ) पेपरवेट 
(आ) वीणा
(इ) रिश्वत 
(ई) मिठाई का डब्बा 

2. पर्ण वाक्य में उत्तर दो :

(क) भोलाराम का घर किस शहर में था? 
(ख) भोलाराम को सेवानिवृत हुए कितने वर्ष हुए थे? 
(ग) भोलाराम की पत्नी ने भोलाराम को किस बीमारी का शिकार बताया? 
(घ) भोलाराम ने मकान मालिक को कितने साल से किराया दिया था?
(ङ) बड़े साहब ने नारद से भोलाराम की पेंशन मंजूर करने के बदले क्या माँगा? 


3. संक्षेप में उत्तर दो: 

(क) 'पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।' - यहाँ किस घटना का संकेत मिलता है? 
(ख) यमदूत ने भोलाराम के जीव के लापता होने के बारे में क्या बताया? 
(ग) धर्मराज ने नर्क में किन-किन लोगों के आने की पुष्टि की? उनलोगों ने क्या-क्या अनियमितताएँ की थीं?
(घ) भोलाराम की पारिवारिक स्थिति पर प्रकाश डालो। 
(ड.) 'भोलाराम ने दरख्वातें तो भेजी थीं, पर उन पर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड गई होंगी।'-दफ्तर के बाबू के ऐसा कहने का क्या आशय था। 
(च) चपरासी ने नारद को क्या सलाह दी? 
(छ) बड़े साहब ने नारद को भोलाराम के पेंशन केस के बारे में क्या बताया? 
(ज) 'भोलाराम का जीव' नामक व्यंग्यात्मक कहानी समाज में फैले भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी का पर्दाफाश करता है। कहानी के आधार पर पुष्टि करो। 

आशय स्पष्ट करो: 

(क) दरख्वास्तें पेपरवेट से नहीं दबतीं। 
(ख) यह भी एक मंदिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है। 


भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान

1. पाठ में आए निम्नांकित पदों पर ध्यान दो :
पाप-पुण्य, दान-दक्षिणा, गाना-बजाना, रीति-रिवाज, नाम-पता आदि। प्रत्येक में दो पद हैं और दोनों के बीच योजक (-) चिह्नों का प्रयोग हुआ है। ये पद द्वंद्व समास के उदाहरण हैं। इस प्रकार द्वंद्व समास के दोनों पद प्रधान होते हैं। इसके तीन भेद हैं-(1) इतरेतर द्वंद्व (2) समाहार द्वंद्व और (3) वैकल्पिक द्वंद्व । 

(क) इतरेतर द्वंद्व समास में सभी पद 'और' से जुड़े होते हैं। जैसे
भाई-बहन (भाई और बहन)। राम-कृष्ण (राम और कृष्ण)। इस प्रकार के समास का प्रयोग हमेशा बहुवचन में होता है। 

(ख) समाहार द्वंद्व समास के दोनों पद 'समुच्चयबोधक' से जुड़े होने पर भी अलग-अलग समूह का अस्तित्व न रखकर समूह का बोध कराते हैं। जैसे-दाल-रोटी (दाल और रोटी) अर्थात् भोजन के सभी पदार्थ, हाथ-पाँव (हाथ और पाँव) अर्थात् हाथ और पाँव सहित शरीर के दूसरे अंग भी। 

(ग) जिस समास में दो पदों के बीच 'या', 'अथवा' आदि विकल्प छिपे होते हैं, उसे वैकल्पिक द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास में अक्सर विपरीत अर्थ वाले शब्द जुड़े होते हैं। जैसे-पाप-पुण्य, भला-बुरा, दिन-रात।
नीचे दिए गए द्वंद्व समासों के भेद लिखकर उन्हें वाक्यों में प्रयोग करो: खाना पीना, माँ बाप, घर द्वार, रुपया पैसा, भात दाल, सीता राम. नाक कान, थोड़ा-बहुत, ठंडा-गरम, उत्थान-पतन, आकाश पाताल 

2. दिए गए वाक्य को ध्यान से पढ़ो : 

'क्या बताऊँ ? भोलाराम को गरीबी की बीमारी थी।'-इस वाक्य में 'गरीबी' और 'बीमारी' शब्द भाववाचक संज्ञाएँ हैं, जो क्रमशः 'गरीब' और 'बीमार' विशेषण शब्दों से बने हैं। 

भाववाचक संज्ञाएँ किसी व्यक्ति वस्तु अथवा स्थान के गुण, धर्म, दशा अथवा स्वभाव का बोध कराती हैं। ये क्रमशः जातिवाचक संज्ञा से, विशेषण से, क्रिया से, सर्वनाम से तथा अव्यय से बनती हैं। जैसे - 

लड़का - लड़कपन (जातिवाचक संज्ञा से)
गर्म - गर्मी (विशेषण से) 
लिखना - लिखावट (क्रिया से) 
अपना - अपनापन (सर्वनाम से) 
समीप - सामीप्य (अव्यय से) 

अब पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के भाववाचक संज्ञा बनाओ : 
गरीब, असमर्थ, खराब, त्यागी, तलाश, बहुत, गृहस्थ, कारीगर, अभ्यस्त, मूर्ख, परेशान, नेता, चिल्लाना, वास्तविक, बीमार, ऊँचा

योग्यता-विस्तार : 

1. हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित 'पगडंडियों का जमाना' तथा 'कबीरा आप ठगाइए' नामक व्यंग्यात्मक निबंध पढ़ो और कक्षा में चर्चा करो। 
2. धर्मराज मनुष्यों के पाप-पुण्य का फैसला करते हैं। अपने कर्मों के अनुसार मनुष्य को स्वर्ग या नर्क में स्थान मिलता है। यह कथन कहाँ तक सत्य है। इस विषय में तर्क सहित अपना विचार प्रस्तुत करो। 

यह भी जानें : 

सरकारी सेवाओं के मामले में रिश्वत लेना और देना कानूनन अपराध है। 

उपभोक्ता एवं सूचना अधिकारों के द्वारा आरोपी कर्मचारी और अधिकारी को सरकारी कानून के तहत दंडित किए जाने का प्रावधान है। 

इस विषय में हमें जागरुक होने की आवश्यकता है।


शब्दार्थ एवं टिप्पणी 

अलॉट - आवंटन कराना
रिकार्ड - लेखा-जोखा,अभिलेख
क्रंदन - रोना, रूदन 
इनकम टैक्स = आयकर 
दरख्वास्त = प्रार्थनापत्र 
यमदूत - यमराज के दूत 
फाका = उपवास करना, भूखमरी
विकृत = विरूप, अस्वाभाविक रूप
सती = पतिव्रता स्त्री 
कसर = प्रयास, प्रयत्न
सिद्ध पुरुष = सिद्धियों को वश में करने वाला, कहा आठ प्रकार की होती है।
अभ्यास  = आदी
बदहवास = डरा हुआ
इन्द्रजाल - हाथ की सफाई, जादू का खेल
स्टेशनरी = लेखन सामग्री, कागज-कलम आदि
गुमसुम = चुपचाप
हौजरी = कपड़ा मिल 
नगण्य = जिसे गिना न जा सके प्रस्तुओं का भजन
दीन = गरीब
वीणा = एक प्रकार का वाद्य-यंत्र
तलाश = खोज
रिटायर = सेवानिवृत्त होना,अवकाशप्राप्त करना
ऊँचा सुनना = कुछ कम सुनना


Conclusion:

Textbook-आलोक, भोलाराम का जीव Lesson-4 class 10 hindi Assam seba board Online textbook lesson.


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