Recent in Technology

छोटा जादूगर Lesson-2/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi

Attention Please!

नमस्कार सभी को, अगर आप क्लास १० हिंदी किताब के लेसन को ऑनलाइन पढ़ना चाहते है, तोह ये आर्टिकल आपके लिए हैं।

Class 10 Hindi Textbook-आलोक के Lesson-2 छोटा जादूगर को यहाँ पर ऑनलाइन पढ़ पाएंगे।

निचे सभी लेसन का लिंक मिल जायेगा, आपने इस्सा अनुसार उन् आर्टिकल को भी आप बिलकुल फ्री में पढ़ पाएंगे धन्यबाद।


छोटा जादूगर Lesson-2/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi







जयशंकर प्रसाद (1889-1937)



बाबू जयशंकर प्रसाद का आविर्भाव आधुनिक हिन्दी साहित्य के छायावाद-युग (1918 ई. से 1938 ई. तक) में हआ था । 

आपने अपनी बहमुखी प्रतिभा के बल पर कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध और आलोचना के क्षेत्रों में अमर लेखनी चलाकर आधुनिक कालीन हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। साहित्यकार के अलावा आप इतिहास एवं पुरातत्व के विद्वान तथा एक गंभीर चिन्तक भी थे । 

भारतीय सभ्यता-संस्कृति, धर्म-दर्शन, भक्ति-अध्यात्म के प्रति गहरी रुचि रखने वाले प्रसाद जी ने इन्हें अपनी रचनाओं के माध्यम से उजागर करने का भरपूर प्रयास किया है। 

साथ ही आपने यांत्रिकता, बुद्धिवादिता और भौतिकता की अतिरेकता से उत्पन्न आधुनिक जीवन की विविध मूलभूत समस्याओं को चिह्नित करके अपने ढंग से उनका समाधान निकालने की भी कोशिश की है। इन महान प्रयासों के कारण आपके साहित्य की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।


प्रसाद जी का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित कान्यकुब्जीय वैश्य परिवार में 1889 ई. में हुआ था। 

पिता देवीप्रसाद और बड़े भाई शंभुरत्न जी के असमय निधन होने के कारण सत्रह वर्ष की अवस्था में ही पैतृक कारोबार तथा घर-परिवार का सारा दायित्व प्रसाद जी को संभालना पड़ा। 

आपने घर पर ही संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी और हिंदी का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया। साथ ही वेद, पुराण, उपनिषद, बौद्ध एवं जैन ग्रंथ, भारतीय इतिहास आदि का अध्ययन भी आपने किया। 

'कलाधर' नाम से ब्रजभाषा में कविता-लेखन के साथ प्रसाद जी का साहित्यिक जीवन आरंभ हुआ था। 

परंतु आपने शीघ्र ही खड़ीबोली को अपनाया और अलग-अलग विधाओं में विपुल साहित्य की रचना की। आपके द्वारा प्रयुक्त खड़ीबोली प्रौढ़, प्रांजल कलात्मक एवं संस्कृतनिष्ठ रही है। 1937 ई. में आपका देहावसान हुआ।

भारतीय संस्कृति के चितेरे प्रसाद जी मूलतः कवि-हृदय के थे। आप छायावादी काव्य-धारा के प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आपकी काव्य-रचनाएँ हैं -- 

उर्वशी, वनमिलन, प्रेमराज्य, अयोध्या का उद्धार, शोकोच्छ्वास, बभ्रुवाहन, काननकुसुम, प्रेमपथिक, करुणालय, महाराणा का महत्व, झरना, आँसू (खंडकाव्य), लहर और कामायनी (महाकाव्य) उनके द्वारा विरचित नाटक हैं-

सज्जन कल्याणी-परिणय, प्रायश्चित, राज्यश्री, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना, स्कंदगुप्त, एक घुट, चंद्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी प्रसाद जी ने तीन उपन्यासों की भी रचना की है। 

कंकाल, तितली और इरावती उनके द्वारा विरचित निबंधों का संग्रह है-काव्य और कला तथा अन्य निबंध।

प्रसाद जी ने लगभग सत्तर कहानियाँ हिंदी को भेंट की हैं। ये कहानियां छाया, प्रतिध्वनि, आकाश-दीप, आधी, इंद्रजाल आदि संग्रहों में संकलित हैं। 

उनकी प्रथम कहानी 'ग्राम' 1911 ई. में 'इंदु' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। कहानीकार के रूप में आप भाववादी धारा के प्रवर्तक कहलाएँ। 

आपकी अधिकांश कहानियों में चारित्रिक उदारता, प्रेम, करुणा, त्याग बलिदान, अतीत के प्रति मोह से युक्त भावमूलक आदर्श की अभिव्यक्ति हुई है। 

उन्होंने अपने समकालीन समाज की आर्थिक विपन्नता, निरीहता, अन्याय और शोषण को भी कुछेक कहानियों में चित्रित किया है। 

सहयोग', 'गुदड़ी के लाल', 'अघोरी का मोह', 'विराम चिह्न', 'आकाश-दीप', 'पुरस्कार', 'ममता', 'समुद्र-संतरण', 'मधुआ', 'इंद्रजाल', 'छोटा जादूगर' आदि उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।

'छोटा जादूगर' प्रसाद जी की एक ऐसी मनोरम कहानी है, जिसमें आर्थिक
'विपन्नता और प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए तेरह-चौदह साल के एक लड़के के चरित्र को आदर्शात्मक रूप में उभारा गया है। 

परिस्थिति की माँग से एक बालक किस प्रकार अपने पाँवों पर खड़ा हो जाता है-उसका यहाँ हृदयग्राही चित्रण हुआ है। 

छोटे जादूगर के रूप में प्रस्तुत बालक के मधुर व्यवहार, चतुराई, क्रिया-कौशल, स्वाभिमान और मातृ-भक्ति से पाठक का मन सहज ही द्रवीभूत हो उठता है।



Class 10 Assamese Notes/Solutions





छोटा जादूगर


कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूंज रहा था । 

मैं खड़ा था, उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शरबत पीने वालों को देख रहा था। 

उसके गले में फटे कुरते के ऊपर एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर गम्भीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। 

उसके अभाव में भी सम्पूर्णता थी। मैंने पूछा"क्यों जी, तुमने इसमें क्या देखा?"


"मैंने सब देखा। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं । खिलौने पर निशाना लगाते हैं। तीर से नम्बर छेदते हैं। मुझे तो खिलौने पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। 

जादूगर तो बिल्कुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं दिखा सकता हूँ।"-उसने बड़ी प्रगल्भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रुकावट न थी। 

मैंने पूछा-"और उस परदे में क्या है? वहाँ तुम गए थे?"
"नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सकता ।टिकट लगता है।" 

मैंने कहा-'तो चला मैं वहाँ पर, तुमको लिवा चलूँ।" मैंने मन ही मन कहा-'भाई! आज के तुम्ही मित्र रहे।'

उसने कहा-"वहाँ जाकर क्या कीजिएगा? चलिए निशाना लगाया जाए।"

मैंने उससे सहमत होकर कहा-"तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए।" उसने स्वीकार-सूचक सिर हिला दिया।

मनुष्यों की भीड़ से जाड़े की संध्या भी वहाँ गर्म हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा-"तुम्हारे और कौन है?"

"माँ और बाबूजी।" 
"उन्होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?" 
"बाबूजी जेल में हैं।" 
"क्यों?" 
"देश के लिए।"- वह गर्व से बोला। 
"और तुम्हारी माँ?" "वह बीमार है।" 
"और तुम तमाशा देख रहे हो?"

उसके मुँह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा-"तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूंगा। 

मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती।" 

मैं आश्चर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा। 

"हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी। माँजी बीमार है, इसलिए मैं नहीं गया।" 
"कहाँ?" 
"जेल में। जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्यों न दिखाकर माँ की दवा-दारू करूँ और अपना पेट भरूँ।"

मैंने दीर्घ नि:श्वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्ट नाच रहे थे। मन व्यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा-"अच्छा चलो, निशाना लगाया जाए।"

हम दोनों उस जगह पर पहुंचे, जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए। 

वह निकला पक्का निशानेबाज! उसका कोई गेंद खाली नहीं गया। देखने वाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरे रूमाल में बाँधे, कुछ जेब में रख लिए। 

लड़के ने कहा-"बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए। मैं चलता हूँ।" वह नौ-दो ग्यारह हो गया।मैंने मन ही मन कहा-"इतनी जल्दी आँख बदल गई।"

मैं घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधरउधर टहलता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। 

अकस्मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा-"बाबूजी!" 
मैंने पूछा-"कौन?" 
"मैं हूँ छोटा जादूगर।"


2

कलकत्ता के सुरम्य बोटानिकल उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मण्डली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। 

बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने की खादी का झोला। साफ जाँघिया। और आधी बाँहों का कुरता। 

फिर पर मेरा रूमाल सूत की रस्सी से बँधा हुआ था। 
मस्तानी चाल से झूमता हुआ आकर कहने लगा -

"बाबूजी नमस्ते। आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?" 
"नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।" 
"फिर इसके बाद क्या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?" 
"नहीं जी....तुमको...." क्रोध से कुछ कहने जा रहा था। 

श्रीमती ने कहा-"दिखलाओ जी, तुम तो अच्छे आए। भला कुछ मन तो बहले।" मैं चप हो गया, क्योंकि श्रीमती की वाणी में वह माँ की सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरम्भ किया।

उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बन्दर घुड़कने लगा।

गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।

मैं सोच रहा था। बालक को आवश्यकता ने कितने शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।

ताश के सब पत्ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की

डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्ट अपने-आप नाच रहे थे। मैंने कहा -

"अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।"
श्रीमती ने धीरे से उसे एक रुपया दे दिया। वह उछल उठा। मैंने कहा"लड़के!"

"छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।"
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमती ने कहा-"अच्छा तुम इस रुपए से क्या करोगे?"

"पहले भर पेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कम्बल लूँगा।" मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा-'ओह! कितना स्वार्थी हूँ! मैं उसके एक रुपए पाने पर ईर्ष्या करने लगा था न।"

वह नमस्कार करके चला गया। हम लोग लताकुंज देखने के लिए चले।
उस छोटे-से बनावटी जंगल में संध्या साँय-साँय करने लगी थी। 

अस्ताचलगामी सूर्य की अन्तिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एकदम शान्त वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हवड़ा की ओर आ रहे थे।


रह-रहकर छोटा जादूगर स्मरण होता था। सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कम्बल कांधे पर डाले खड़ा था। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा-"तुम यहाँ कहाँ?"

"मेरी माँ यही है न। अब उसे अस्पताल वालों ने निकाल दिया है।" मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा, तो एक स्त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।

छोटे जादूगर ने कम्बल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिपटते हुए कहा-"माँ!"
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।


3

बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने आफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्ता से मन ऊब गया था। 

फिर भी चलते-चलते एक बार उद्यान को देखने की इच्छा हुई। साथ ही साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता, तो और भी... मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द लौट आना था।

दस बज चुका था। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मोटर रोककर उतर पड़ा। 

वहाँ बिल्ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नता की तरी नहीं थी। 

जब वह औरों को हँसाने की चेष्टा कर रहा था, तब वह जैसे स्वयं कँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्चर्य से देख रहा था। 

खेल हो जाने पर पैसा बटोर कर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षणभर के लिए स्फूर्तिमान हो गया। 

मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा-"आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं?" ___ माँ ने कहा है कि आज तुरन्त चले आना। मेरी घड़ी समीप है।"अविचल भाव से उसने कहा।

"तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए हो?" मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्य के सुख-दुःख का माप अपना ही साधन तो है। उसी के अनुपात से वह तुलना करता है।

उसके मुँह पर वही परिचित तिरस्कार की रेखा फूट पड़ी। 
उसने कहा-"न क्यों आता?"
और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था। 

क्षणभर में मुझे अपनी भूल मालुम हो गई। उसके झोले को गाडी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा-"जल्दी चलो।" मोटर वाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।

कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँमाँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किन्तु स्त्री के मुँह से "बे..." निकल कर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। 

जादूगर उससे लिपटा रो रहा था, मैं स्तब्ध था। उस उज्ज्वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।



Class 10 Assamese Textbook(Online Read)




अभ्यासमाला




बोध एवं विचार 

1. सही विकल्प का चयन करो: -

(क) बाबू जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ था - 
(अ) काशी में
(आ) इलाहाबाद में 
(इ) पटना में
(ई) जयपुर में 

(ख) जयशंकर प्रसाद जी का साहित्यिक जीवन किस नाम से आरंभ हुआ था? 
(अ) 'विद्याधर' नाम से
(आ) 'कलाधर' नाम से 
(इ) 'ज्ञानधर' नाम से
(ई) 'करुणाधर' नाम से 

(ग) प्रसाद जी का देहावसान हुआ -
(अ) 1935 ई. में
(आ) 1936 ई. में 
(इ) 1937 ई. में
(ई) 1938 ई. में 

(घ) कार्निवाल के मैदान में लड़का चुपचाप किनको देख रहा था?
(अ) चाय पीने वालों को 
(आ) मिठाई खाने वालों को 
(इ) गाने वालों को
(ई) शरबत पीने वालों को 

(ङ) लड़के को जादूगर का कौन-सा खेल अच्छा मालूम हुआ?
(अ) खिलौने पर निशाना लगाना 
(आ) चूड़ी फेंकना
(इ) तीर से नम्बर छेदना 
(ई) ताश का खेल दिखाना


2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:

(क) जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रथम कहानी का नाम क्या है? 
(ख) प्रसाद जी द्वारा विरचित महाकाव्य का नाम बताओ। 
(ग) लड़का जादूगर को क्या समझता था? 
(घ) लड़का तमाशा देखने परदे में क्यों नहीं गया था? 
(ङ) श्रीमान ने कितने टिकट खरीद कर लड़के को दिए थे? 
(च) लड़के ने हिंडोले से अपना परिचय किस प्रकार दिया था? 
(छ) बालक (छोटे जादूगर) को किसने बहुत ही शीघ्र चतुर बना दिया था?
(ज) श्रीमान कलकत्ते में किस अवसर पर की छुट्टी बिता रहे थे? 
(झ) सड़क के किनारे कपड़े पर सजे रंगमंच पर खेल दिखाते समय छोटे जादूगर की वाणी में स्वभावसुलभ प्रसन्नता की तरी क्यों नहीं थी? 
(ज) मृत्यु से ठीक पहले छोटे जादूगर की माँ के मुँह से कौन-सा अधूरा शब्द
निकला था? 


3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में): -

(क) बाबू जयशंकर प्रसाद की बहुमुखी प्रतिभा का परिचय किन क्षेत्रों में मिलता है? 
(ख) श्रीमान ने छोटे जादूगर को पहली भेंट के दौरान किस रूप में देखा था? 
(ग) “वहाँ जाकर क्या कीजिएगा?" छोटे जादूगर ने ऐसा कब कहा था? 
(घ) निशानेबाज के रूप में छोटे जादूगर की कार्य-कुशलता का वर्णन करो। 
(ङ) कलकत्ते के बोटानिकल उद्यान में श्रीमान-श्रीमती को छोटा जादूगर किस रूप में मिला था? 
(च) कलकत्ते के बोटानिकल उद्यान में श्रीमान ने जब छोटे जादूगर को
'लडके!' कहकर संबोधित किया, तो उत्तर में उसने क्या कहा? 
(छ) "आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं?"- इस प्रश्न के उत्तर में छोटे जादूगर ने क्या कहा? 


4. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में)

(क) प्रसाद जी की कहानियों की विशेषताओं का उल्लेख करो। 
(ख) "क्यों जी , तुमने इसमें क्या देखा? - इस प्रश्न का उत्तर छोटे जादूगर ने किस प्रकार दिया था ? 
(ग) अपने माँ-बाप से संबंधित प्रश्नों के उत्तर में छोटे जादूगर ने क्या क्या कहा था? 
(घ) श्रीमान ने तेरह-चौदह वर्ष के छोटे जादूगर को किसलिए आश्चर्य से देखा था? 
(ङ) श्रीमती के आग्रह पर छोटे जादूगर ने किस प्रकार अपना खेल दिखाया? 
(च) हवड़ा की ओर आते समय छोटे जादगर और उसकी माँ के साथ श्रीमान की भेंट किस प्रकार हुई थी? 
(छ) सड़क के किनारे कपड़े पर सजे रंगमंच पर छोटा जादूगर किस मनःस्थिति
में और किस प्रकार खेल दिखा रहा था?
(ज) छोटे जादूगर और उसीक माँ के साथ श्रीमान की अंतिम भेंट का अपने
शब्दों में वर्णन करो। 


5. सम्यक उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में): -

(क) बाबू जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक देन का उल्लेख करो। 
(ख) छोटे जादूगर के मधुर व्यवहार एवं स्वाभिमान पर प्रकाश डालो। 
(ग) छोटे जादूगर की चतुराई और कार्य-कुशलता का वर्णन करो। 
(घ) छोटे जादूगर के देश-प्रेम और मातृ-भक्ति का परिचय दो।
(ङ) छोटे जादूगर की कहानी से तुम्हें कौन-सी प्रेरणा मिलती है? 


6. सप्रसंग व्याख्या करो: -

(क) “मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपूर्णता थी।" 
(ख) “श्रीमती की वाणी में वह माँ की सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता।"

भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान 

1. सरल, मिश्र और संयुक्त वाक्यों को पहचानो :
(क) कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। 
(ख) माँजी बीमार है, इसलिए मैं नहीं गया। 
(ग) मैं घूमकर पान की दुकान पर आ गया। 
(घ) माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना।
(ङ) मैं भी पीछे था, किंतु स्त्री के मुँह से 'बे...' निकलकर रह गया। 

2. अर्थ लिखकर निम्नांकित मुहावरों का वाक्य में प्रयोग करो।
नौ दो ग्यारह होना, आँखें बदल जाना, घड़ी समीप होना, दंग रह जाना,
श्रीगणेश होना, अपने पाँवों पर खड़ा होना, अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारना 

3. निम्नलिखित शब्दों के लिंग-परिवर्तन करो:
रस्सी, जादूगर, श्रीमान, गुड़िया, वर, स्त्री, नायक, माली 

4. निम्नांकित शब्दों के लिंग निर्धारित करो:
रुकावट, हँसी, शरबत, वाणी, भीड़, तिरस्कार, निशाना, झील 

5. निम्नलिखित शब्दों के वचन परिवर्तन करो: 
खिलौना, आँख, दुकान, छात्रा, बिल्ली, साधु, कहानी


* योग्यता-विस्तार 

1. प्रसाद जी द्वारा रचित 'ममता' शीर्षक कहानी का संग्रह करके पढ़ो।
2. किसी किशोर किशोरी की कर्तव्य-परायणता पर एक छोटी-सी कहानी लिखो और अपने भाई-बहन को सुनाओ। 
3. खेल तमाशे दिखाकर आजीविका कमाने वाले बच्चों के प्रति समाज का
कर्तव्य क्या होना चाहिए-इस विषय पर कक्षा में चर्चा करो।

* शब्दार्थ एवं टिप्पणी


विनोद = परिहास, मन बहलावा
फुहारा = फुहार अथवा हल्की वर्षा छोड़ने वाला उपकरण
निकम्मा =  किसी भी काम का न होना
दंग रह जाना = आचार्योचकित रह जाना
बोटानिकल = बनस्पति संबंधी
चारखाना = वह वस्त्र जिसमें रंगीन धारियों के चौखुटे खाने बने हो
क्रुद्धो = क्रोध से भरा हुआ 
बड़ा दिन - क्रिसमस
घड़ी समीप होना - मृत्यृ का समय पास आना
कलनाद = मधुर शब्दो
बिषाद = दुःख, वेदना
अभाव = गरीबी, आर्थिक बिपन्नता
प्रगल्भता = निः संकोच बात करने का भाव
तिरस्कार = अपमान, भोतसना 
नौ दो ग्यारह होना = भाग जाना
उद्दान = बाग़, बगीचा
मस्तानी = मस्ती भरी
वाचालता = अधिक बात करने का भाव
चिथड़ा = फटा कपड़ा
स्फूर्तिमान = उत्साहित, आनन्दित
अपने पावो पर खड़ा होना = स्वावलम्बी बनना


Conclusion:

Class 10 hindi आलोक lesson-2 छोटा जादूगर Online textbook Assam seba board





Post a Comment

0 Comments

People

Ad Code