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नींव की ईंट Lesson-1/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Textbook-आलोक के Lesson-1 नींव की ईंट को यहाँ पर ऑनलाइन पढ़ पाएंगे।

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नींव की ईंट Lesson-1/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi







रामवृक्ष बेनीपुरी (1902-1968)



यशस्वी ललित निबंधकार रामवृक्ष बेनीपुरी जी आधुनिक हिंदी साहित्य की अमर विभूतियों में अन्यतम हैं। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। 

आपने गद्य-लेखक, शैलीकार, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी, समाज-सेवी और हिंदी प्रेमी के रूप में अपनी प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी है। 

राष्ट्र-निर्माण, समाज-संगठन और मानवता के जयगान को लक्ष्य मानकर बेनीपुरी जी ने ललित निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, नाटक, उपन्यास, कहानी, बाल साहित्य आदि विविध गद्य-विधाओं में जो महान रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, वे आज की युवा पीढ़ी के लिए भी अमोघ प्रेरणा की स्रोत हैं।

रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जन्म 1902 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अंतर्गत बेनीपुर नामक गाँव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता के देहावसान हो जाने के कारण आपका पालन-पोषण ननिहाल में हुआ । 

मैट्रिक की परीक्षा पास करने से पहले 1920 ई. में वे महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी के रूप में आपको 1930 ई. से 1942 ई. तक का समय जेलयात्रा में ही व्यतीत करना पड़ा। 

इसी बीच आप पत्रकारिता एवं साहित्य-सर्जना में भी जुड़े रहे। 'बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन' को खड़ा करने में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वाधीनता-प्राप्ति के पश्चात् आपने साहित्य-साधना के साथ-साथ देश और समाज के नवनिर्माण कार्य में अपने को जोड़े रखा। 1968 ई. में आपका स्वर्गवास हुआ।

बेनीपुरी जी पत्रकारिता जगत से साहित्य-साधना के संसार में आए। छोटी उम्र से ही आप पत्र-पत्रिकाओं में लिखने लगे थे। आगे चलकर आपने 'तरुण भारत', 'किसान मित्र', 'बालक', 'युवक', 'कैदी', 'कर्मवीर', 'जनता', 'तूफान', 'हिमालय' और 'नई धारा' नामक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। आपकी साहित्यिक रचनाओं की संख्या लगभग सौ है, जिनमें से अधिक रचनाएँ 'बेनीपुरी ग्रंथावली' नाम से प्रकाशित हो चुकी हैं। 

उनकी कृतियों में से 'गेहूँ और गुलाब' (निबंध और रेखाचित्र), 'वंदे वाणी विनायको' (ललित गद्य), 'पतितों के देश में' (उपन्यास), 'चिता के फूल' (कहानी संग्रह), माटी की मूरतें' (रेखाचित्र), 'अंबपाली' (नाटक) विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

रामवृक्ष बेनीपुरी जी एक सशक्त गद्यकार हैं। उनकी भाषा-शैली जीवंत, अलंकारयुक्त, प्रवाहमयी और ओज गुण से परिपूर्ण है। रेखाचित्र, संस्मरण और ललित निबंधों की रचना में आपको विशेष सफलता मिली है। 

मानव सभ्यता का लेखा-जोखा लेने, भारतीय समाज के अतीत, वर्तमान और भविष्य में झाँकने और प्रतीकार्थ भरने की विशेषताओं के कारण बेनीपुरी जी के ललित निबंध बहुचर्चित रहे हैं।


नींव की ईंट' बेनीपुरी जी के रोचक एवं प्रेरक ललित निबंधों में अन्यतम है। 'नींव की ईंट' का प्रतीकार्थ है-समाज का अनाम शहीद, जो बिना किसी यश-लोभ के समाज के नव-निर्माण हेतु आत्म-बलिदान के लिए प्रस्तुत है। 

'सुंदर इमारत' का आशय है- नया सुंदर समाज । 'कंगूरे की ईंट' का प्रतीकार्थ है-समाज का यश-लोभी सेवक, जो प्रसिद्धि, प्रशंसा अथवा अन्य किसी स्वार्थवश समाज का काम करना चाहता है।

निबंधकार के अनुसार भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के सैनिकगण नींव की ईंट की तरह थे, जबकि स्वतंत्र भारत के शासकगण कंगूरे की ईंट निकले। 

भारतवर्ष के सात लाख गाँवों, हजारों शहरों और सैकड़ों कारखानों के नव-निर्माण हेतु नींव की ईंट बनने के लिए तैयार लोगों की जरूरत है। 

परंतु विडंबना यह है कि आज कंगूरे की ईंट बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है। इस रूप में भारतीय समाज का नव-निर्माण संभव नहीं ।

इसलिए निबंधकार ने देश के नौजवानों से आह्वान किया है कि वे नींव की ईंट बनने की कामना लेकर आगे आएँ और भारतीय समाज के नव-निर्माण में चुपचाप अपने को खपा दें।



Class 10 Assamese Textbook(Online Read)




नींव की ईंट



वह जो चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत हैं, वह किस पर टिकी है ? इसके कंगूरों को आप देखा करते हैं, क्या कभी आपने इसकी नींव की ओर भी ध्यान दिया है ?

दुनिया चकमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, आवरण के नीचे जो ठोस सत्य है उस पर कितने लोगों का ध्यान जाता है ?

ठोस 'सत्य' सदा 'शिवम्' होता ही है, किंतु वह हमेशा ही सुंदरम्' भी हो यह आवश्यक नहीं। ___सत्य कठोर होता है, कठोरता और भद्दापन साथ-साथ जन्मा करते हैं, जिया करते हैं। 

हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं - इसीलिए सत्य सेभी भागते हैं। नहीं तो, हम इमारत के गीत नींव के गीत से प्रारंभ करते।

वह ईंट धन्य है, जो कट-छंटकर कंगूरे पर चढ़ती है और बरबस लोक-लोचनों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।

किंतु, धन्य है वह ईंट, जो जमीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ गई और इमारत की पहली ईंट बनी!

क्योंकि इसी पहली ईंट पर उसकी मजबूती और पुख्तेपन पर सारी इमारत की अस्ति-नास्ति निर्भर करती है।

उस ईंट को हिला दीजिए, कंगूरा बेतहाशा जमीन पर आ रहेगा। कंगूरे के गीत गानेवाले हम, आइए, अब नींव के गीत गाएँ।

वह ईंट जो जमीन में इसलिए गड़ गई कि दुनिया को इमारत मिले, कंगूरा मिले! ___ वह ईंट, जो सब ईंटों से ज्यादा पक्की थी, जो ऊपर लगी होती तो कंपूरे की शोभा सौ गुनी कर देती!

किंतु, जिसने देखा, इमारत की पायदारी उसकी नींव पर मुनहसिर होती है, इसलिए उसने अपने को नींव में अर्पित किया।

वह ईंट, जिसने अपने को सात हाय जमीन के अंदर इसलिए गाड़ दिया कि इमारत जमीन के सौ हाथ ऊपर तक जा सके।

वह ईंट जिसने अपने लिए अंधकूप इसलिए कबूल किया कि ऊपर के उसके साथियों को स्वच्छ हवा मिलती रहे, सुनहली रोशनी मिलती रहे। वह ईंट, जिसने अपना अस्तित्व इसलिए विलीन कर दिया कि संसार एक सुंदर सृष्टि देखे।

सुंदर सृष्टि! सुंदर सृष्टि हमेशा ही बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का। सुंदर इमारत बने, इसलिए कुछ पक्की-पक्की लाल ईंटों को चुपचाप नींव में जाना है।
सुंदर समाज बने, इसलिए कुछ तपे-तपाए लोगों को मौन-मूक शहादत का लाल सेहरा पहनना है। शहादत और मौन-मूक! जिस शहादत को शोहरत मिली, जिस बलिदान को प्रसिद्धि प्राप्त हुई, वह इमारत का कंगूरा है-मंदिर का कलश है।

हाँ, शहादत और मौन-मूक! समाज की आधारशिला यही होती है।
ईसा की शहादत ने ईसाई धर्म को अमर बना दिया, आप कह लीजिए। 

किंतु मेरी समझ से ईसाई धर्म को अमर बनाया उन लोगों ने, जिन्होंने उस धर्म के प्रचार में अपने को अनाम उत्सर्ग कर दिया। 

उनमें से कितने जिंदा जलाए गए, कितने सूली पर जढ़ाए गए, कितने वन-वन की खाक छानते जंगली जानवरों के शिकार हुए, कितने उससे भी भयानक भूख-प्यास के शिकार हुए।

 उनके नाम शायद ही कहीं लिखे गए हों-उनकी चर्चा शायद ही कहीं होती हो किंतु ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहा है।

वे नींव की ईंट थे, गिरजाघर के कलश उन्हीं की शहादत से चमकते हैं। 

आज हमारा देश आजाद हुआ सिर्फ उनके बलिदानों के कारण नहीं, जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है।

देश का शायद कोई ऐसा कोना हो, जहाँ कुछ ऐसे दधीचि नहीं हुए हों, जिनकी हड्डियों के दान ने ही विदेशी वृत्रासुर का नाश किया।

हम जिसे देख नहीं सकें, वह सत्य नहीं है, यह है मूढ़ धारणा!
ढूँढने से ही सत्य मिलता है। हमारा काम है, धर्म है, ऐसी नींव की ईंटों की ओर ध्यान देना।
सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हमने पहला कदम बढ़ाया है।


इस नए समाज के निर्माण के लिए भी हमें नींव की ईंट चाहिए। अफसोस, कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईट बनने की कामना लुप्त हो रही है!

सात लाख गाँवों का नव-निर्माण! हजारों शहरों और कारखानों का नव-निर्माण! कोई शासक इसे संभव नहीं कर सकता। जरूरत है ऐसे नौजवानों की, जो इस काम में अपने को चुपचाप खपा दें। 

जो एक नई प्रेरणा से अनुप्राणित हों, एक नई चेतना से अभिभूत, जो शाबाशियों से दूर हों दलबंदियों से अलग।

जिनमें कंगूरा बनने की कामना न हो, कलश कहलाने की जिनमें वासना न हो। सभी कामनाओं से दूर सभी वासनाओं से दूर।

उदय के लिए आतुर हमारा समाज चिल्ला रहा है। हमारी नींव की ईंटें किधर हैं ? देश के नौजवानों को यह चुनौती है!



Class 10 Assamese Notes/Solutions





अभ्यासमाला



बोध एवं विचार 

1. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :

(क) रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म कहाँ हुआ था? 
(ख) बेनीपुरी जी को जेल की यात्राएँ क्यों करनी पड़ी थी? 
(ग) बेनीपुरी जी का स्वर्गवास कब हुआ था? 
(घ) चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत वस्तुतः किस पर टिकी होती है? 
(ङ) दुनिया का ध्यान सामान्यतः किस पर जाता है? 
(च) नींव की ईंट को हिला देने का परिणाम क्या होगा? 
(छ) सुंदर सृष्टि हमेशा ही क्या खोजती है? 
(ज) लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश वस्तुत: किनकी शहादत से चमकते हैं? 
(झ) आज किसके लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है?
(ज) पठित निबंध में 'सुंदर इमारत' का आशय क्या है? 


2. अति संक्षिप्त उत्तरदो (लगभग 25 शब्दों में):

(क) मनुष्य सत्य से क्यों भागता है? 
(ख) लेखक के अनुसार कौन-सी ईंट अधिक धन्य है?
(ग) नींव की ईंट की क्या भूमिका होती है ? 
(घ) कंगूरे की ईंट की भूमिका स्पष्ट करो। 
(ङ) शहादत का लाल सेहरा कौन-से लोग पहनते हैं और क्यों? 
(च) लेखक के अनुसार ईसाई धर्म को किन लोगों ने अमर बनाया और कैसे?
(छ) आज देश के नौजवानों के समक्ष चुनौती क्या है? 


3. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में): 

(क) मनुष्य सुंदर इमारत के कंगूरे को तो देखा करते हैं, पर उसकी नींव की ओर उनका ध्यान क्यों नहीं जाता?
(ख) लेखक ने कंगरे के गीत गाने के बजाय नींव के गीत गाने के लिए क्यों आह्वान किया है?
(ग) सामान्यतः लोग कंगूरे की ईंट बनना तो पसंद करते हैं, परंतु नींव की ईट बनना क्यों नहीं चाहते? 
(घ) लेखक ईसाई धर्म को अमर बनाने का श्रेय किन्हें देना चाहता है और क्यों? 
(ङ) हमारा देश किनके बलिदानों के कारण आजाद हुआ? 
(च) दधीचि मुनि ने किसलिए और किस प्रकार अपना बलिदान किया था? 
(छ) भारत के नव-निर्माण के बारे में लेखक ने क्या कहा है? 
(ज) 'नींव की ईंट' शीर्षक निबंध का संदेश क्या है? 


सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में) 

(क) 'नींव की ईंट' का प्रतीकार्थ स्पष्ट करो। 
(ख) 'कंगूरे की ईंट' के प्रतीकार्थ पर सम्यक् प्रकाश डालो। 
(ग) 'हाँ, शहादत और मौन-मूक! समाज की आधारशिला यही होती है'
का आशय बताओ। 


5. सप्रसंग व्याख्या करोः 

(क) "हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोडते हैं. इसीलिए सच से भी भागते हैं।" 
(ख) "सुंदर सृष्टि! सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का ।" (ग) “ अफसोस, कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है!" 

भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान 

1. निम्नलिखित शब्दों में से अरबी-फारसी के शब्दों का चयन करो:
इमारत, नींव, दुनिया, शिवम्, जमीन, कंगूरा, मुनहसिर, अस्तित्व, शहादत,
कलश, आवरण, रोशनी, बलिदान, शासक, आजाद, अफसोस, शोहरत 

2. निम्नांकित शब्दों का प्रयोग करके वाक्य बनाओ:
चमकीली, कठोरता, बेतहाशा, भयानक, गिरजाघर, इतिहास 

3. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करो :
(क) नहीं तो, हम इमारत की गीत नींव की गीत से प्रारंभ करते। 
(ख) ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहे हैं।
(ग) सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हम पहला कदम बढ़ाए हैं। 
(घ) हमारे शरीर पर कई अंग होते हैं। 
(ङ) हम निम्नलिखित रूपनगर के निवासी प्रार्थना करते हैं। 
(च) सब ताजमहल की सौंदर्यता पर मोहित होते हैं। 
(छ) गत रविवार को वह मुंबई जाएगा। 
(ज) आप कृपया हमारे घर आने की कृपा करें। 
(झ) हमें अभी बहुत बातें सीखना है। 
(ज) मुझे यह निबंध पढ़कर आनंद का आभास हुआ। 


4. निम्नलिखित लोकोक्तियों का भाव-पल्लवन करो : 

(क) अधजल गगरी छलकत जाए।
(ख) होनहार बिरबान के होत चिकने पात। 
(ग) अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत।
(घ) जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय। 

5. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो अर्थ बताओ :
अंबर, उत्तर, काल, नव, पत्र, मित्र, वर्ण, हार, कल, कनक 

6. निम्नांकित शब्द-जोड़ों के अर्थ का अंतर बताओ: 
अगम-दुर्गम, अपराध-पाप, अस्त्र-शस्त्र, आधि-व्याधि, दुख-खेद, स्त्री,पत्नी, आज्ञा-अनुमति, अहंकार-गर्व 

योग्यता-विस्तार 

1. रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित 'मशाल' तथा 'गेहूँ और गुलाब' शीर्षक निबंधों का संग्रह करके पढ़ो और उनमें निहित संदेश सहपाठियों को बताओ। 

2. ललित निबंध की विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करो।


शब्दार्थ एवं टिप्पणी

सुघड़ = सुडौल, सुंदर आकार वाला 
इमारत . = बड़ा पक्का मकान
चकमक - चमकीलापन
बरबस = बलपूर्वक
पुख्तापन = मजबूती, दृढ़ता
बेतहासा = शीग्रता से, जल्दी ही
मुनहसिर = आश्रित, निर्भर
बिलीन = मिटा देना 
शोहरत = प्रसिद्धि, यश
ईसा = ईसा मसीह, जिन्होंने ईसाई धर्म का प्रबर्तन प्रसार किया था 
दधीचि = एक प्रसिद्ध ऋषि, जिन्होंने अपनी हड्डीओं का दान द्वेब्ऱज इंद्रा का बज्र बनाने के लिए कर दिया था| 
अनुप्राणित = प्रेरित, प्रोत्साहित
वासना = तीब्र इस्छा, कामना
कंगूरा = महल या भवन का सबसे ऊपरी भाग 
निंव = महल भवन आदि का सबसे निचे का भाग 
लोक - लोचन = लोगों  की आँख 
अस्ति - नास्ति = होना न होना, अस्तित्व
पायदारी = टिकाऊपन 
अंधकूप = अंधकार भरा निचा स्थान 
शहादत = बलिदान 
कलश = मंदिर अदि सबसे ऊपरी भाग 
आजाद = स्वाधीन, स्वतंत्र 
उत्सर्ग = न्योछाबर, बलिदान 
बृत्रासुर = एक अत्याचारी राक्षस
मूढ़ = मुर्ख, वेबकूफी पूर्ण 
अफसोच = दुःख 
होडा होड़ी = प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता
अभिभूत = आनंद - मग्न 
चुनौती = ललकार 


Conclusion:

नींव की ईंट Lesson-1 class 10 hindi Online textbook आलोक reading for online readers Assam seba board 







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