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पर्यावरण और प्रदूषण अथवा, प्रदूषण की रोकथाम/ निबंध लेखन class 10


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नमस्कार, सभी को इस पर निबंध लेखन पर्यावरण और प्रदूषण अथवा, प्रदूषण की रोकथाम के बारे मे लिखा गया है।

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पर्यावरण और प्रदूषण अथवा, प्रदूषण की रोकथाम/ निबंध लेखन class 10


पर्यावरण और प्रदूषण अथवा, प्रदूषण की रोकथाम



प्रकृति का मानव के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, लेकिन आज प्रकृति का सौन्दर्य तिराहित होता चला जा रहा है। 

आज वातावरण अत्यन्त विषैला होता जा रहा है। मानव को न तो श्वास लेने के लिए स्वच्छ वायु मिल पा रही है, न पीने के लिए स्वच्छ जल। 

आज का वातावरण अत्यन्त ही प्रदूषित है। जनसंख्या का तीर्व गति से बढ़ना प्रदूषण का मुख्य कारण है। कल-कारखानों सानिकलने वाले धुएँ से वाय प्रदषण बढ़ रहा है। 

जनसंख्या विस्तार के कारण रहने स्थान में कमी आ गई है। वर्तमान युग में गम्भीर समस्या का रूप लेता चला जा रहा है। 

यदि इस ओर ध्यान न दिया गया. तो एक दिन सम्पूर्ण मानव जाति विनाश कगार पर खड़ी हो जाएगी। आज भौतिकवाद का युग है। इसने मनुष्य की

जीवन-शैली को परिवर्तित कर दिया है। आधुनिक सुख-सुविधाओं के कारण मानव प्रकृतिक सम्पदाओं का दोहन कर रहा है। 

सामान्यतः वे समस्त कारण जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानव के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, प्रदुषण कहलाता है। 

जल, वाय एवं भूमि के भौतिक एवं रासायनिक या जैविक गुणों में होनेवाला कोई भी अवांछनीय परिर्वन प्रदूषण है, जो मानव के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव छोड़ते हैं। 

खाने के लिए सन्तुलित आहार मिलना दुष्कर है। बड़े-बड़े नगरों में साधारण मनुष्य नाली में पड़े कीड़े के समान जीवन-यापन कर रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण का दूसरा प्रमुख कारण वैज्ञानिक आविष्कार है। कल-कारखानों को चलाने के लिए ईंधन के रूप में पेट्रोल, डीजल, कोयला आदि का उपयोग किया जाता है। 

कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धूएँ वातावरण को विषाक्त बना रहा है, जिसके कारण मनुष्य का साँस लेना दूभर हो गया है। 

वाहनों, मोटर, कार, स्कूटर आदि से निकलने वाले धुएँ से भी वायु प्रदूषण बढ़ता चला जा रहा है। 

कार्बन डाइ-ऑक्साइड, मोनोक्साइड और न जाने कितने दषित तत्त्वों ने वायमण्डल को दुषित कर दिया है। 

ये गैसें हमारे शरीर पर बहत ही हानिकारक प्रभाव डालती हैं। कार्बन डाई-ऑक्साइड व सल्फर डाइ-ऑक्साइड आदि गैसें फेफडों में प्रवेश करके घातक अम्ल का निर्माण करती है।

इसके अतिरिक्त कारखानों से गैसों का रिसाव होने का हमेशा भय बना रहता है। हमारे देश में अनेक गैस रिसाव काण्ड हो चुके हैं। 

दिसम्बर, सन् 1984 के भोपाल गैस रिसाव काण्ड से कोई भी भारतवासी अनभिज्ञ नहीं है।

आज विश्व के सभी राष्ट्र परमाणु बमों के परीक्षण में संलग्न हैं। इन परीक्षणों के कारण वातावरण अत्यन्त ही विषाक्त प्रभाव छोड रहा है। 

बम विस्फोटों के कारण जो जहरीली गैसे निकलती हैं, वे अनेक प्रकार के रोगों को जन्म दे रही हैं. जिसके परिणामस्वरूप मानव जीवन पर अत्यन्त विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण में युद्ध भी अपनी अहं भूमिका अदा कर रहे हैं। हाइड्रोजन एटमबम, तोप के गोले व बन्दूक की गोलियाँ सैनिकों को तो मौत की नींद सुलाती ही हैं साथ ही जीवित व्यक्तियों पर भी अपना प्रतिकूल प्रभाव छोड़ती हैं।

अन्य अनेक कीटनाशक औषधियाँ. जैसे- डी. डी. टी.. गैमेक्सीन आदि भी वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

घरों से निकलने वाला कचरा. मल-मत्र तथा कारखानों से निकलने वाला गन्दा जल नदियों में जाकर मिल जाता है। 

इससे जल प्रदूषित हो जाता है। कुछ लोग नदियों में शवों को प्रवाहित कर देते हैं। प्रदषित जल को पीने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। 

प्रदूषित जल पीने से पीलिया, हैजा, पेचिश आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अब तो गंगा तेरा पानी अमत वाली उक्ति असत्य प्रतीत होती है। 

प्रदूषित जल मनुष्यों, पशुओं एवं कृषि के लिए भी हानिकारक है। प्रदूषित जल के उपयोग से मिट्टी के अनेक पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो रहे हैं।

खाद, कीटनाशक, दवाएँ व रासायनिक पदार्थ भूमि की उर्वरा शक्ति को कम हो। साथ ही खाद्य पदार्थों में अनेक हानिकारक तत्त्व प्रवेश कर जाते हैं।

नगरों में लाउडस्पीकरों, वाहनों, मशीनों के कारण हमें प्रत्येक क्षण शोरगल वातावरण में रहने के लिए विवश होना पड़ रहा है। 

शोर के कारण स्नाय-मण्डल असन्तुलित होता जा रहा है। बहरापन की बीमारी बढ़ती जा रही है। 

प्रतिक्षण कोहराम भरे वातावरण में रहने के कारण मनुष्य तनावग्रस्त रहता है, इससे अनेक प्रकार के रोग पनपते जा रहे हैं, जैसे- नींद न आना, सिर दर्द आदि जिसके कारण प्रतिक्षण बेचैनी का अनुभव होता रहता है।

प्रदूषण को पूर्ण रूप से समाप्त तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे कम तो किया जा सकता है। सर्वप्रथम वृक्षारोपण के द्वारा भी वायुप्रदूषण को कम किया जा सकता है। 

जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने से भी काफी हद तक प्रदूषण कम हो सकता है। कारखानों की चिमनियों में फिल्टर का उपयोग आवश्यक कर दिया जाना चाहिए। 

क़ल-कारखानों तथा घरों से निकलने वाले दूषित जल को भूमिगत कर देना चाहिए। रेडियो, लाउडस्पीकरों के शोर को बन्द करवाने के लिए कठोर कानून बनाया जाये। 

रासायनिक अवशेषों को भी यथास्थान भूमिगत कर देना चाहिए। अधिक वृक्ष लगाने से प्राण वायु ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होगी तथा वृक्ष कार्बन डाइ-ऑक्साइड को अवशोषित कर लेंगे।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि प्रदूषण आधुनिक विज्ञान की ही देन है। वर्तमान युग में जितने भी आविष्कार हो रहे हैं, उतनी ही प्रदूषण की समस्या निरन्तर बढ़ती चली जा रही है। 

प्रदूषण के द्वारा मानव काल के गाल में समा जा रहा है। इससे प्राणियों को अहित हो रहा है। जीवन को सुरक्षित रखने के लिए प्रदूषण पर रोक लगाना अत्यावश्यक है। 

प्रत्येक मानव का कर्तव्य है कि प्रदूषण को दूर करने के लिए ठोस कदम उठायें। यह कार्य मात्र राष्ट्रीय सरकार ही नहीं कर सकती है, उसके लिए सबका सहयोग अपेक्षित है।


Conclusion:


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Wrote by Akshay

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