Recent in Technology

पद-त्रय Lesson-8/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi

Attention Please!

नमस्कार सभी को, अगर आप क्लास १० हिंदी किताब के लेसन को ऑनलाइन पढ़ना चाहते है, तोह ये आर्टिकल आपके लिए हैं।

Class 10 Hindi Textbook-आलोक के Lesson-8 पद-त्रय को यहाँ पर ऑनलाइन पढ़ पाएंगे।

निचे सभी लेसन का लिंक मिल जायेगा, आपने इस्सा अनुसार उन् आर्टिकल को भी आप बिलकुल फ्री में पढ़ पाएंगे धन्यबाद।


पद-त्रय Lesson-8/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi





Class 10 Assamese Textbook(Online Read)





मीराँबाई (1498-1546)



हिंदी की कृष्ण-भक्ति काव्य धारा में कवयित्री मीराँवाई को महाकवि सूरदास जी के बाद ही स्थान प्राप्त है। 

हालाँकि हिंदी कवयित्रियों में आप अग्रणी स्थान की अधिकारी हैं। भारतीय जन-साधारण के बीच कबीरदास, सूरदास और तुलसीदास के भजनों की तरह मीरा-भजन भी समान रूप से प्रिय रहे हैं। 

कवयित्री मीराँबाई द्वारा विरचित गीत-पद हिंदी के साथ-साथ भारतीय साहित्य की भी अमूल्य निधि हैं। भक्ति-भावना एवं काव्यत्व के सहज संतुलन के कारण आपके गीत-पद अनूठे बन पड़े हैं।

कवयित्री मीराँबाई भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका थीं। अपने आराध्य के प्रति एकनिष्ठ प्रेम-भक्ति के कारण आपको कृष्ण प्रेम-दीवानी' की आख्या मिली। 

अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण एवं उनकी एकनिष्ठ साधना का जो दृष्टांत भक्तकवयित्री मीराँबाई ने प्रस्तुत किया, वह सबके लिए आदरणीय एवं अनुकरणीय है।

कृष्ण-प्रेम-भक्ति की सजीव प्रतिमा मीराँबाई के जीवन वृत्त को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कहा जाता है कि आपका जन्म सन् 1498 के आस-पास प्राचीन राजपूताने के अंतर्गत 'मेड़ता' प्रांत के 'कुड़की' नामक स्थान में राठौड़ वंश की मेड़तिया शाखा में हुआ था। 
बचपन में ही माता के निधन होने और पिता राव रत्न सिंह के भी युद्धों में व्यस्त रहने के कारण बालिका मीराँबाई का लालन-पालन उनके दादा राव दूदाजी की देखरेख में हुआ। 

परम कृष्ण-भक्त दादाजी के साथ रहते-रहते बालिका मीरा के कोमल हृदय में कृष्ण-भक्ति का बीज अंकुरित होकर बढ़ने लगा। आगे आपने कृष्ण जी को ही अपना आराध्य प्रभु एवं पति मान लिया।

सन् 1516 में मेवाड़ के महाराजा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराज के साथ मीराँबाई का विवाह हुआ, परंतु दुर्भाग्यवश विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराज जी का स्वर्गवास हो गया। 

राजपतों की तत्कालीन परंपरा का विरोध करते हुए क्रांतिकारिणी मीराँ सती नहीं हईं। वे जग सहाग को मिथ्या और अविनाशी प्रभु कृष्ण जी को सत्य मानती थीं। 

प्रभु की आराधना और साधुओं की संगति में उनका समय बीतता चला। राजघराने की ओर से उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाने लगी, परंतु मीराँबाई भक्त प्रहलाद की तरह टस से मस नहीं हुई। 

अब वे अपने प्रभु गिरिधर नागर की खोज में राजप्रासाद से निकल पड़ी। साधु संतों के साथ घूमते-घामते और अपने प्रभु को रिझाने के लिए नाचते गाते मीराँबाई अंत में द्वारकाधाम पहुँची। 

प्रसिद्ध है कि वहाँ श्री रणछोड़ जी के मंदिर में अपने प्रभु गिरिधर गोपाल का भजन-कीर्तन करते-करते सन् 1546 के आसपास वे भगवान की मूर्ति में सदा के लिए विलीन हो गयीं।

कवयित्री मीराँबाई की रचनाओं में प्रामाणिकता की दृष्टि से कृष्ण-भक्तिपरक लगभग दो सौ फुटकर पद ही विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 

ये फुटकर पद मीराँबाई की पदावली नाम से प्रसिद्ध हैं। ये पद कवयित्री मीराँबाई के कृष्ण भक्तिमय हृदय के स्वतः उद्गार हैं। वैसे तो उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी की उपभाषा राजस्थानी में काव्य रचना की है, परंतु उसमें ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी, गुजराती आदि के भी शब्द मिल जाते हैं। 

कृष्ण प्रेम-माधुरी, सहज अभिव्यक्ति और सांगीतिक लय के मिलन से कवयित्री मीराँबाई के पद त्रिवेदी संगम के समान पावन एवं महत्वपूर्ण बन पड़े हैं।

'पद-त्रय' शीर्षक के अंतर्गत संकलित प्रथम पद में आराध्य प्रभु कृष्ण के श्री चरणों में कवयित्री मीराँबाई के पूर्ण समर्पण का भाव व्यंजित हुआ है। 

वे कहती हैं कि मैं तो गोपाल जी के श्री चरणों की शरण में आ गयी हूँ। पहले यह बात किसी को मालूम नहीं थी, पर अब तो संसार को इस बात का पता चल गया है। 

अतः प्रभु गिरिधर मुझ पर कृपा करें, मुझे दर्शन दें, शीघ्र ही मेरी सुध लें। मैं तो प्रभु जी के चरण-कमलों में अपने को न्योछावर कर चुकी हूँ। 

द्वितीय पद में कवयित्री मीराबाई अपने जीवनाधार सुंदर श्याम जी को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कहती हैं कि हे स्वामी! तुम्हारे विरह में मैं पके पाण की तरह पीली पड़ गयी हूँ। 

तुम्हारे आए बिना मैं सुध-बुध खो बैठी हूँ, मेरा ध्यान तो तुम्हीं पर है, मुझे किसी दूसरे की आशा नहीं है, अत: तुम जल्दी आकर मुझसे मिलो और मेरे मान की रक्षा करो। 

तृतीय पद में कवयित्री मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए कहती हैं कि सभी मनुष्य कुसंग छोड़ें और सत्संग में बैठकर कृष्ण का कीर्तन सुनें, वे काम-क्रोधादि छ: रिपुओं को चित्त से निकाल दें और प्रभु कृष्ण प्रेम रंग-रस से सराबोर हो उठे।



Class 10 Assamese Notes/Solutions





पद-त्रय



(1) 
मैं तो चरण लगी गोपाल। 
जब लागी तब कोऊँ न जाने, अब जानी संसार। 
किरपा कीजै, दरसन दीजै, सुध लीजै तत्काल। 
मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर चरण-कमल बलिहार।।

(2) 
म्हारे घर आवौ सुंदर श्याम । 
तुम आया बिन सुध नहीं मेरो, पीरी परी जैसे पाण। 
म्हारे आसा और ण स्वामी, एक तिहारो ध्याण। 
मीरों के प्रभु वेग मिलो अब, राषो जी मेरो माण ।।

(3) 
राम नाम रस पीजै मनुआँ, राम नाम रस पीजै । 
तज कुसंग सतसंग बैठ णित हरि चरचा सुण लीजै।
काम क्रोध मद लोभ मोह कूँ, बहा चित्त तूं दीजै। 
मीरों के प्रभु गिरधर नागर, ताहि के रंग में भीजै ।।



अभ्यासमाला




बोध एवं विचार 

1. 'हाँ' या 'नहीं' में उत्तर दो : 

(क) हिंदी की कृष्ण-भक्ति काव्य-धारा में कवयित्री मीराँबाई का स्थान सर्वोपरि है। 
(ख) कवयित्री मीराँबाई भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका थीं। 
(ग) राजपूतों की तत्कालीन परंपरा का विरोध करते हुए क्रांतिकारिणी मीराँ सती नहीं हुई। 
(घ) मीराँबाई अपने को श्री कृष्ण जी के चरण-कमलों में पूरी तरह समर्पित नहीं कर पायी थीं। 
(ड.) मीराँबाई ने संदर श्याम जी को अपने घर आने का आमंत्रण दिया है। 
2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :

(क) कवयित्री मीराबाई का जन्म कहाँ हुआ था? 
(ख) भक्त-कवयित्री मीराँबाई को कौन-सी आख्या मिली है? 
(ग) मीराँबाई के कृष्ण भक्तिपरक फुटकर पद किस नाम से प्रसिद्ध हैं? 
(घ) मीराँबाई के पिता कौन थे? 
(ङ) कवयित्री मीराँबाई ने मनुष्यों से किस नाम का रस पीने का आह्वान किया है?

3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):

(क) मीराँ-भजनों की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो। 
(ख) मीराँबाई का बचपन किस प्रकार बीता था? 
(ग) मीराँबाई का देहावसान किस प्रकार हुआ था?
(घ) कवयित्री मीराँबाई की काव्य भाषा पर प्रकाश डालो। 

4. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में): 

(क) प्रभु कृष्ण के चरण-कमलों पर अपने को न्योछावर करने वाली मीराँबाई ने अपने आराध्य से क्या-क्या निवेदन किया है? 
(ख) संदर श्याम को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कवयित्री ने उनसे क्या-क्या कहा है? 
(ग) मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए मीराँबाई ने उन्हें कौन-सा उपदेश दिया है ?

5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में):

(क) मीराँबाई के जीवन वृत्त पर प्रकाश डालो । 
(ख) पठित पदों के आधार पर मीराँबाई की भक्ति भावना का निरूपण करो।
(ग) कवयित्री मीराँबाई का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो। 

6. सप्रसंग व्याख्या करो:

(क) “ मैं तो चरण लगी..............चरण-कमल बलिहार।" 
(ख) "म्हारे घर आवौ.. ...राषो जी मेरे माण।" 
(ग) “राम नाम रस पीजै..............ताहि के रंग में भीजै।" 

भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान 

1. निम्नांकित शब्दों के तत्सम रूप लिखो:
किरपा, दरसन, आसा, चरचा, श्याम, धरम, किशन, हरख 

2. वाक्यों में प्रयोग करके निम्नलिखित लगभग समोच्चरित शब्द जोड़ों के अर्थ का अंतर स्पष्ट करोः 
संसार-संचार, चरण-शरण, दिन-दीन, कुल-कूल, कली-कलि, प्रसाद-प्रासाद, अभिराम-अविराम, पवन-पावन 

3. निम्नलिखित शब्दों के लिंग-परिवर्तन करो :
कवि, अधिकारिणी, बालिका, दादा, पति, भगवान, भक्तिन 

4. विलोमार्थक शब्द लिखो:
पूर्ण, सजीव, प्राचीन, कोमल, अपना, विरोध, मिथ्या, कुसंग, सुंदर, अपमान, गुप्त, आनंद 

5. निम्नलिखित शब्दों के वचन-परिवर्तन करो:
कविता, निधि, कवि, पौधा, कलम, औरत, सखी, बहू 

योग्यता-विस्तार 
1. कवयित्री मीराँबाई द्वारा विरचित निम्नलिखित पदों को समझने एवं गाने का प्रयास करो: 

(क) पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सत गुरु, किरपा करि अपनायो। 
जनम जनम की पूँजी, जग में सभी खोवायो। 
खरचै नहीं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो। 
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो। 
मीरों के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख हरख जस गायो ।

(ख) माई म्हें गोविंदो लीन्हो मोल।
कोई कहै सस्तो, कोई कहै महंगो, लीनो तराजू तोल। 
कोई कहै घर में कोई कहै बन में, राधा के संग किलोल। 
मीरों के प्रभ गिरधर नागर, आवत प्रेम के मोल। 

(ग) मैं गिरधर के घर जाऊँ। 
गिरधर म्हाँरों साँचों प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ। 
रैण पडै तब ही उठि जाऊँ, भोर भये उठि आऊँ। 
रैण दिना वाके संग खेलूँ यूँ त्यूँ वाहि लुभाऊँ। 
जो पहिरावै सोई पहिलं, जो दे सोई खाऊँ। 
मेरी उणकी प्रीत पुराणी, उण विण पल न रहाऊँ। 
जहँ बैठावे तितही बैठू, बेचे तो बिक जाऊँ।
मीरों के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊँ।। 
2. कवयित्री मीराँबाई के पदों में निहित संदेशों की प्रासंगिकता पर कक्षा में चर्चा करो। 
3. अपने पति भोजराज की मृत्यु के पश्चात् राजपूतों की प्रचलित परंपरा का विरोध करते हुए मीराँबाई सती नहीं हुई थीं। सती प्रथा के बारे में जानकारी एकत्र करो। 

शब्दार्थ एवं टिप्पणी 

चरण लगना = शरण में जाना 
दरसन = दर्शन 
गोपाल - गौ चराने वाले श्रीकृष्ण
सुध लीजै - खबर लीजिए 
गिरधर = गिरिधर, गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले श्रीकृष्ण 
म्हॉरर = हमारे


Conclusion:

Agar aap ek Online textbook reader ho toh yeh site aapko bohot madad karega.









Wrote by Akshay

Post a Comment

0 Comments

People

Ad Code