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सड़क की बात Lesson-5/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Textbook-आलोक के Lesson-5 सड़क की बात को यहाँ पर ऑनलाइन पढ़ पाएंगे।

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सड़क की बात Lesson-5/ Textbook-आलोक/ Class 10 Hindi




Class 10 Assamese Notes/Solutions





रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941)



'विश्व-कवि' की आख्या से विभूषित गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर उन प्रातः स्मरणीय मनीषियों की परंपरा में आते हैं, जिन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अपने समग्र रूप में चित्रित किया।

आपने अपनी रचनाओं में न सिर्फ भारत की गौरवमयी सभ्यता-संस्कृति को अभिव्यक्ति दी, बल्कि विश्व मानवतावादी दृष्टि से पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के उज्ज्वल तत्वों को अपनाने का आह्वान भी किया। 

आप मूलतः बांग्ला के कवि-कलाकार थे, परन्तु अपनी उदारवादी मानवतावादी दृष्टि के कारण आपने क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता का, फिर राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीयता एवं विश्वबंधुत्व का स्पर्श किया। इस प्रकार वे पहले बंगाल के, फिर भारतवर्ष के और फिर संपूर्ण विश्व के चहेते बने।
कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, 1861 ई. को कोलकाता के जोरासाँको में एक संपन्न एवं प्रतिष्ठित बांग्ला परिवार में हुआ था। आपके पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर जी दार्शनिक प्रवृत्ति के प्रख्यात समाज-सुधारक थे। 

रवींद्रनाथ ठाकुर की शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः घर पर ही हुई। काव्य, संगीत, चित्रकला, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक सुधार एवं राजनीतिक सुरुचि का वातावरण उन्हें परंपरा और परिवार से मिला।

उन्होंने प्रकृति एवं जीवन की खुली पुस्तक को लगन के साथ पढ़ा। स्वाध्याय के बल पर आपने विविध विषयों का विपुल ज्ञान प्राप्त कर लिया। सत्रह वर्ष की अवस्था में आप इंग्लैंड गए। 

वहाँ आपको कई सुप्रतिष्ठित अंग्रेज कवि-साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे पश्चिमी विचारधारा के आलोक से दीप्त होकर स्वदेश वापस आए।

काव्य प्रतिभा के धनी रवींद्रनाथ ठाकुर ने सात वर्ष की कोमल अवस्था में ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था। 

तब से लेकर देहावसान के समय तक आपकी अमर लेखनी बराबर चलती रही। आपने कई हजार कविताओं, गीतों, कहानियों, रूपकों (भावनाट्य) एवं निबंधों की रचना की। 

आपने उपन्यास भी लिखे, जिनमें 'गोरा' और 'घरेबाइरे' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आपके द्वारा रचित कहानियों में से काबुलीवाला' एक कालजयी कहानी है। 

कवि-शिरोमणि रवींद्रनाथ ठाकर की कीर्ति का आधार-स्तंभ है उनका काव्य-ग्रंथ 'गीतांजलि', जिस पर आपको सन् 1913 ई. में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। 

आपकी अन्य रचनाओं में मानसी', 'संध्या-संगीत', 'नैवेद्य', 'बलाका', 'क्षणिका' आदि अन्यतम हैं। आपके द्वारा विरचित सैकड़ों गीतों से रवींद्र-संगीत नामक एक निराली संगीत-धारा ही बह निकली है। 

आपके द्वारा रचित 'जन गण मन....' भारतवर्ष का राष्ट्रीय संगीत है, तो आपकी ही रचना 'आमार सोणार बांग्ला' पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश का राष्ट्रीय संगीत है।

कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में बोलपुर के निकट 'शांतिनिकेतन' नाम के एक शैक्षिक-सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की थी। 

यह केन्द्र गुरुदेव के सपनों का मूर्त रूप रहा और आगे यह विश्व-भारती विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आपने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी रुचि ली थी। 

शांतिनिकेतन में आने पर मोहनदास करमचंद गाँधी को आपने 'महात्मा' के रूप में संबोधित किया था। 

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के पक्ष में अपना मत देते हुए गुरुदेव ने कहा था-"उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए जो देश के सबसे बड़े हिस्से में बोली जाती हो, अर्थात् हिन्दी।" 7 अगस्त, 1947 ई. को इस महान पुण्यात्मा का स्वर्गवास हुआ।

कवि, गीतकार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार, संगीतकार, कलाकार, समाज-सुधारक, शिक्षा-संस्कृतिप्रेमी और राजनीतिज्ञ की बहुमुखी प्रतिभा के अधिकारी होते हुए भी गुरुदेव रवींद्रनाथ मूलतः कवि-हृदय के थे। 

उनके कोमल हृदय में अगर विश्वमानवता के प्रति प्रेम, करुणा और सहानुभूति थी, तो मानवेतर प्राकृतिक उपकरणों, जैसे- पेड़-पौधे, नदी-निर्झर, पशु-पक्षी, वन-उपवन, फूल-तारे, सूरजचाँद आदि के प्रति भी भरपूर आकर्षण था। 

उनकी सूक्ष्म एवं पैनी दृष्टि जड़ और चेतन दोनों प्रकार के पदार्थों के अंतरतम तक पहुँच जाती थी। आपके द्वारा रचित 'सड़क की बात' वस्तुतः सड़क की आत्मकथा है। 

लेखक ने इसमें सड़क का मानवीकरण किया है। सड़क अपनी आप-बीती अथवा राम-कहानी स्वयं सुना रही है। 

दरअसल इस पाठ में लेखक ने अपनी सूक्ष्म और पैनी दृष्टि से सड़क के अंतरतम का निरीक्षण करके उसकी आकांक्षा, स्थिति एवं उनके मनोभावों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि सड़क की बातें जीवंत हो उठी हैं। यह एक मनोरम आत्मकथात्मक निबंध है। 

इसमें सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की कई महत्वपूर्ण बातें भी उजागर हुई हैं।





सड़क की बात



मैं सड़क हूँ। शायद किसी के शाप से चिरनिद्रित सुदीर्घ अजगर की भाँति वन-जंगल और पहाड़-पहाड़ियों से गुजरती हुई पेड़ों की छाया के नीचे से और दूर तक फैले हुए मैदानों में ऊपर से देश-देशांतरों को घेरती हुई बहुत दिनों से बेहोशी की नींद सो रही हूँ। 

जड़ निद्रा में पड़ी-पड़ी मैं अपार धीरज के साथ अपनी धूल में लोटकर शाप की आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही हूँ। 
हमेशा से जहाँ-तहाँ स्थिर हूँ, अविचल हूँ, हमेशा से एक ही करवट सो रही हूँ, इतना भी सुख नहीं कि अपनी इस कड़ी और सूखी सेज पर एक भी मुलायम हरी घास या दूब डाल सकूँ।

इतनी भी फुरसत नहीं कि अपने सिरहाने के पास एक छोटा-सा नीले रंग का वनफूल भी खिला सकूँ।

मैं बोल नहीं सकती पर अंधे की तरह सब कुछ महसूस कर सकती हूँ। दिन-रात पैरों की ध्वनि, सिर्फ पैरों की आहट सुना करती हूँ। 

अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हूँ, मैं समझ जाती हूँ कि कौन घर जा रहा है, कौन परदेश जा रहा है, कौन काम से जा रहा है, कौन आराम करने जा रहा है, कौन उत्सव में जा रहा है और कौन श्मशान को जा रहा है। 

जिसके पास सुख की घर-गृहस्थी है, स्नेह की छाया है, वह हर कदम पर सुख की तस्वीर खींचता है, आशा के बीज बोता है। 

जान पड़ता है, जहाँ-जहाँ उसके पैर पड़ते हैं, वहाँ-वहाँ क्षण भर में मानो एक-एक लता अंकुरित और पुष्पित हो उठेगी। 

जिसके पास घर नहीं, आश्रय नहीं, उसके पदक्षेप में न आशा है, न अर्थ है, उसके कदमों में न दायाँ है, न बायाँ है, उसके पैर कहते हैं, मैं चलूँ तो क्यों, और ठहरूँ तो किसलिए? 

उसके कदमों से मेरी सुखी हुई धूल मानो और सूख जाती है। 

संसार की कोई भी कहानी मैं पूरी नहीं सुन पाती। आज सैकड़ों-हजारों वर्षों से मैं लाखों-करोड़ों लोगों की कितनी हँसी, कितने गीत, कितनी बातें सुनती आई हूँ। 

पर थोडी-सी बात सुन पाती हूँ। बाकी सुनने के लिए जब कान लगाती हूँ तब देखती हूँ कि वह आदमी ही नहीं रहा । 

इस तरह न जाने कितने युगों की कितनी टूटी-फूटी बातें और बिखरे हुए गीत मेरी धूल के साथ धूल बन गए हैं और धूल बनकर अब भी उड़ते रहते हैं।

वह सुनो गा रही है-कहते-कहते कह नहीं पाई । आह, ठहरो, जरा गीत को पूरा कर जाओ, पूरी बात तो सुन लेने दो मुझे, पर कहाँ ठहरी वह? गाते-गाते न जाने कहाँ चली गई? 

आखिर तब मैं सुन ही नहीं पाई । बस आज आधी रात तक उसकी पग-ध्वनि मेरे कानों में गूंजती रहेगी। मन ही मन सोचूंगी कौन थी वह? कहाँ जा रही थी न जाने ? 

जो बात न कह पाई उसी को फिर कहने गई । अब की बार जब फिर उससे भेंट होगी, वह जब मुँह उठाकर इसके मुँह की तरफ ताकेगा, तब "कहते-कहते" फिर "कह नहीं पाई" तो?

समाप्ति और स्थायित्व शायद कहीं होगा, पर मुझे तो नहीं दिखाई देता। एक चरण चिह्न को भी तो मैं ज्यादा देर तक नहीं रख सकती। 

मेरे ऊपर लगातार चरण-चिह्न पड़ रहे हैं, पर नए पाँव आकर पुराने चिह्नों को पोंछ जाते हैं। जो चला जाता है वह तो पीछे कुछ छोड़ ही नहीं जाता। कदाचित उसके सिर के बोझ से कुछ मिलता भी है तो हजारों चरणों के तले लगातार कुचला जाकर कुछ ही देर में वह धूल में मिल जाता है।

मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सबका उपाय मात्र हँ। मैं किसी का घर नहीं हूँ, पर सबको घर ले जाती हूँ। 

मुझे दिन-रात यही संताप सताता रहता है कि मुझ पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता। मुझ पर कोई खड़ा रहना पसंद नहीं करता। 

जिनका घर बहुत दूर है, वे मुझे ही कोसते हैं और शाप देते रहते हैं । मैं जो उन्हें परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वार तक पहुँचा देती हूँ, इसके लिए कृतज्ञता कहाँ पाती हूँ ? 

वे अपने घर आराम करते हैं, घर पर आनंद मनाते हैं, घर में उनका सुख-सम्मिलन होता है, बिछुड़े हुए सब मिल जाते हैं, और मुझ पर केवल थकावट का भाव दरसाते हैं, केवल अनिच्छाकृत श्रम हुआ समझते हैं, मुझे केवल विच्छेद का कारण मानते हैं।

क्या इसी तरह बार-बार दूर ही से घर क झराख म स पख पसार कर बाहर आती हुई मधुर हास्य-लहरी मेरे पास आते ही शून्य में विलीन हो जाया करेगी ? 

घर के उस आनंद का एक कण भी, एक बूंद भी मैं नहीं पाऊँगी?

कभी-कभी वह भी पाती हूँ। छोटे-छोटे बच्चे जो हँसते-हँसते मेरे पास आते हैं और शोरगुल मचाते हुए मेरे पास आकर खेलते हैं, अपने घर का आनंद वे मेरे पास ले आते हैं। 

उनके पिता का आशीर्वाद और माता का स्नेह घर से बाहर निकल कर, मेरे पास आकर सड़क पर ही मानो अपना घर बना लेता है। मेरी धूल में वे स्नेह दे जाते हैं, प्यार छोड़ जाते हैं। 

मेरी धूल को वे अपने वश में कर लेते हैं और अपने छोटे-छोटे कोमल हाथों से उसकी ढेरी पर हौले-हौले थपकियाँ दे-देकर परम स्नेह से उसे सुलाना चाहते हैं। 

अपना निर्मल हृदय लेकर बैठे-बैठे वे उसके साथ बातें करते हैं। हाय-हाय, इतना स्नेह, इतना प्यार पाकर भी मेरी यह धूल उसका जवाब तक नहीं देत पाती । मेरे लिए कैसा शाप है यह!

छोटे-छोटे कोमल पाँव जब मेरे ऊपर से चले जाते हैं, तब अपने को मैं बड़ी कठिन अनुभव करती हूँ, मालूम होता है उनके पाँवों में लगती होगी। 

उस समय मुझे कुसुम कली की तरह कोमल होने की साध होती है। अरुण चरण ऐसी कठोर धरती पर क्यों चलते हैं? किंतु, यदि न चलते तो शायद कहीं भी हरी-हरी घास पैदा न होती।

प्रतिदिन नियमित रूप से जो मेरे ऊपर चलते हैं, उन्हें मैं अच्छी तरह पहचानती हूँ। पर वे नहीं जानते कि उनके लिए मैं कितनी प्रतीक्षा किया करती हूँ। मैं मन ही मन कल्पना कर लेती हूँ। 

बहुत दिन हुए, ऐसी ही एक प्रतिमा अपने कोमल चरणों को लेकर दोपहर को बहुत दूर से आती, छोटेछोटे दो नूपुर रूनझुन करके उसके पाँव में रो-रोकर बजते रहते। 

शायद उसके ओठ बोलने के ओठ न थे, शायद उसकी बड़ी-बड़ी आँखें संध्या के आकाश की भाँति म्लान दृष्टि से किसी के मुँह की ओर देखती रहती।

ऐसे कितने ही पाँवों के शब्द नीरव हो गए हैं। मैं क्या उनकी याद रख सकती हूँ? सिर्फ उन पाँवों की करुण नूपुर-ध्वनि अब भी कभी-कभी याद आ जाती हैं। 

पर मुझे क्या घडी भर भी शोक या संताप करने की छुट्टी मिलती है? शोक किस-किसके लिए करें? ऐसे कितने ही आते हैं और चले जाते हैं।

उफ कैसा कड़ा घाम है! एक बार साँस छोड़ती हूँ और तपी हुई धूल सुनील आकाश को धुआँधार करके उड़ी चली जाती है। 
अमीर और गरीब, जन्म और मृत्यु सब कुछ मेरे ऊपर एक ही साँस में धूल के स्रोत की तरह उड़ता चला जा रहा है। इसलिए सड़क के न हँसी है, न रोना। 

मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँ, और पड़ी रहँगी।



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अभ्यासमाला



बोध एवं विचार 

1. एक शब्द में उत्तरदो:

(क) गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर किस आख्या से विभूषित हैं? 
(ख) रवींद्रनाथ ठाकुर जी के पिता का नाम क्या था?
(ग) कौन-सा काव्य-ग्रंथ रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कीर्ति का आधार-स्तंभ है?
(घ) सड़क किसकी आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही है?
(ङ) सड़क किसकी तरह सब कुछ महसूस कर सकती है? 

2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :

(क) कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म कहाँ हुआ था? 
(ख) गुरुदेव ने कब मोहनदास करमचंद गाँधी को 'महात्मा' के रूप में संबोधित किया था? 
(ग) सड़क के पास किस कार्य के लिए फुरसत नहीं है? 
(घ) सड़क ने अपनी निद्रावस्था की तुलना किससे की है?
(ङ) सड़क अपनी कड़ी और सूखी सेज पर क्या नहीं डाल सकती?

3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):

(क) रवींद्रनाथ ठाकुर जी की प्रतिभा का परिचय किन क्षेत्रों में मिलता है? 
(ख) 'शांतिनिकेतन' के महत्व पर प्रकाश डालो। 
(ग) सड़क शाप-मुक्ति की कामना क्यों कर रही है? 
(घ) सुख की घर-गृहस्थी वाले व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क क्या समझ जाती है? 
(ङ) गृहहीन व्यक्ति के पैरों की आहट सुनने पर सड़क को क्या बोध होता है?
(च) सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण-चिल को क्यों ज्यादा देर तक नहीं देख सकती? 
(छ) बच्चों के कोमल पाँवों के स्पर्श से सड़क में कौन-से मनोभाव बनते है?
(ज) किसलिए सड़क को न हँसी है, न रोना? 
(झ) राहगीरों के पाँवों के शब्दों को याद रखने के संदर्भ में सड़क ने क्या कहा है?

4. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में): 

(क) जड़ निद्रा में पड़ी सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके बारे में क्या क्या समझ जाती है? 
(ख) सड़क संसार की कोई भी कहानी क्यों पूरी नहीं सुन पाती ? 
(ग) “मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सबका उपाय मात्र हूँ।" -सड़क ने ऐसा क्यों कहा है? 
(घ) सड़क कब और कैसे घर का आनंद कभी-कभी महसूस करती है? 
(ङ) सड़क अपने ऊपर से नियमित रूप से चलने वालों की प्रतीक्षा क्यों करती है? 

5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में): 

(क) सड़क का कौन-सा मनोभाव तुम्हें सर्वाधिक हृदयस्पर्शी लगा और क्यों? 
(ख) सड़क ने अपने बारे में जो कुछ कहा है, उसे संक्षेप में प्रस्तुत करो। 
(ग) सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की जो बातें उजागर हुई हैं, उन पर संक्षिप्त प्रकाश डालो।

6. सप्रसंग व्याख्या करो : 

(क) “अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हूँ।" 
(ख) “मुझे दिन-रात यही संताप सताता रहता है कि मुझ पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता। 
(ग) “मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँ और पड़ी रहूँगी। 

भाषा एवं व्याकरण ज्ञान

1. निम्नलिखित सामासिक शब्दों का विग्रह करके समास का नाम लिखो:
दिन-रात, जड़निद्रा, पग-ध्वनि, चौराहा, प्रतिदिन, आजीवन, अविल, राहखर्च, पथभ्रष्ट, नीलकंठ, महात्मा, रातोंरात 

2. निम्नांकित उपसर्गों का प्रयोग करके दो-दो शब्द बनाओ :
परा, अप, अधि, उप, अभि, अति, सु, अव 

3. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्गों को अलग करो:
अनुभव, बेहोश, परदेश, खुशबू, दुर्दशा, दुस्साहस, निर्दय 

4. निम्नांकित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखो:
सड़क, जंगल, आनंद, घर, संसार, माता, आँख, नदी 

5. विपरीतार्थक शब्द लिखोः
मृत्यु, अमीर, शाप, छाया, जड़, आशा, हँसी, आरंभ, कृतज्ञ, पास, निर्मल, जवाब, सूक्ष्म, धनी, आकर्षण 

6. संधि-विच्छेद करो:
देहावसान, उज्ज्वल, रवींद्र, सूर्योदय, सदैव, अत्यधिक, जगन्नाथ, उच्चारण, संसार, मनोरथ, आशीर्वाद, दुस्साहस, नीरस

योग्यता-विस्तार 

(1) रवींद्रनाथ ठाकुर जी द्वारा रचित किसी अन्य निबंध अथवा कहानी का संग्रह करके पढ़ो और उसका सार अपने सहपाठियों को बताओ। 
(2) 'जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि'- इस कहावत पर ध्यान रखते हुए कवि-सामर्थ्य पर कक्षा में चर्चा करो। 
(3) 'सड़क की बात' की तरह ही पत्थर की बात' शीर्षक के अंतर्गत पत्थर - की आत्मकथा लिखो। (4) 'नोबेल पुरस्कार' और 'शांतिनिकेतन' के बारे में जानकारी एकत्र करो।

शब्दार्थो एवं टिप्पिणी :

शाप = वह शब्दो या वाक्य जो किसी अनिष्ट की कामना से कहा जाये
बेहोशी = अचेतन अवस्था
मुलायम = कोमल
सिरहाना = बिस्तर पर सिर रखने का स्थान 
पदस्वेप = जमीन पर पाव रखने का स्थान
संताप = मन का दुःख
कोसना =  गाली देना, भोला-बुरा कहना
हस्य लहरी = हँसी की तरंगे 
साध = इच्छा, कामना 
घाम = सूर्य का ताप, धुप 
चिर निद्रित = सदा सोया हुआ
देशांतर = अन्य देश, अन्य स्थान 
सेज = सय्या, बिस्तर
फुरसत = खली समय, अवकाश
तस्वीर = चित्र, छवि
सैकोरो = सौ - सौ
आखिर = अंत मे
तबियत से = स्थिर और चिंतामुक्त होकर
कृतज्ञता = किसीके उपकार को मानने का भाव
हौले - हौले = धीरे - धीरे 
अरुण = लाल
धुआँधार = धुएं से भरा काला


Conclusion:

Class 10 hindi Lesson-5 सड़क की बात, Textbook-आलोक Assam seba board Online Book lessons.





Wrote by Akshay

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