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पद्-त्रय/ पाठ-८/ क्लास १० हिंदी नोट्स

यहां पर आपको क्लास १० हिंदी के पाठ ८ पद्-त्रय के नोट्स मिलेंगे। निचे क्लास १० दूसरे आर्टिकल के लिंक भी मिलेंगे।


पद्-त्रय/ पाठ-८/ क्लास १० हिंदी नोट्स







पाठ-८
पद्-त्रय




मीराँबाइ




कवयित्री का परिचय




कृष्ण-प्रेम-दीवानी मीराँबाई को हिन्दी की कृष्ण-भक्ति काव्य-धारा में महाकवि सूरदास जी के बाद ही स्थान प्राप्त है। हालाँकि जन-साधारण के बीच कबीरसूर-तुलसी के भजनों की तरह मीराँ-भजन भी समान रूप से प्रिय रहे हैं। 

संपूर्ण हिन्दी काव्य-धारा की कवयित्रिओं में मीराँबाई अग्रणी स्थान की अधिकारिणी हैं। भक्ति एवं काव्यत्व के सहज संतुलन के कारण आपके गीत-पद अनूठे बन पड़े हैं। ये एक ओर भक्त-हृदयों के प्रिय हैं, तो दूसरी ओर काव्य-रसिकों को भी समान रूप से प्रिय रहे हैं। 
कवयित्री मीराँबाई की एकनिष्ठ साधना सबके लिए आदरणीय एवं अनुकरणीय है। कृष्ण-प्रेम-भक्ति की साकार प्रतिमा मीराँबाई की जीवन-वृत को लेकर मत भेद विद्यमान है। कहा जाता है कि आपका जन्म सन् 1498 के आस-पास प्राचीन राजपूताने के अंतर्गत मेड़ता प्रांत के कुड़की नामक स्थान में राठौड़ वंश की मेड़तिया शाखा में हुआ था। 

बचपन में ही मीराँबाई की माता जी का देहांत हुआ था और आपके पिता जी राव रत्नसिंह भी युद्धों में व्यस्त रहा करते थे। इसीलिए मीराँबाई का लालन-पालन उनके दादा राव दूदाजी के तत्वाधान में हुआ। 

दादाजी की संगति में ही उनके हृदय में कृष्ण-भक्ति के बीज अंकुरित होकर बढ़ने लगे और फिर आपने कृष्ण जी को अपना आराध्य प्रभु एवं पति मान लिया। सन् 1516 में मेवाड़ के महाराजा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराम के साथ मीराँबाई का विवाह हुआ परंतु दुर्भाग्यवश विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराम का स्वर्गवास हो गया। 

वे जग सुहाग को मिथ्या और अविनाशी प्रभु कृष्णजी को सत्य मानती थी। राजघराने की ओर से उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ दी गईं, पर मीराँजी टस से मस नहीं हुईं। वे अपने आराध्य कृष्णजी की खोज में निकल पड़ी। साधु-संतों के साथ घूमते और अपने आराध्य को रिझाने के लिए भजन गाते मीराँबाई अन्त में द्वारका पहुँची। 

कहा जाता है कि वहाँ श्री रणछोड़जी के मन्दिर में अपने प्रभु गिरिधर नागर का भजन-कीर्तन करते-करते सन् 1546 के आस-पास वे भगवान की मूर्ति में विलीन हो गईं।

मीराँबाई ने मुख्य रूप से हिन्दी की उपभाषा राजस्थानी में काव्य रचना की है। ब्रज, खड़ीबोली, पंजाबी, गुजराती आदि के शब्द भी उनमें शामिल हैं। कृष्ण-प्रेम-माधुरी, सहज अभिव्यक्ति और सांगीतिक लय के मिलन से कवयित्री मीराँबाई के पद त्रिवेणीसंगम के समान पावन एवं महत्वपूर्ण बन पड़े हैं।




पाठ का सारांश



प्रथम पद में मीरां बाई कहती है कि वह तो भगवान कृष्ण के शरण में आ गई हैं। पहले यह बात किसी को ज्ञात नहीं थी। अब तो सारा संसार जान गया है। अतः मीरा प्रार्थना करती है कि कृष्ण उन पर कृपा करें। वे शीघ्र ही मीरा की सुथ लें। दूसरे पद में मीरां बाई अपने जीवन आधार भगवान कृष्ण को अपने घर बुलाती हैं। कहती है कि भगवान कृष्ण के प्रेम में वे पके पान की तरह पीली हो गई हैं। कृष्ण के बिना वे अपना सुध-बुध खो बैठी है। उन्हें किसी दूसरे की आशा नहीं है। तीसरे पद में मीरां बाई लोगों को भगवान कृष्ण की भक्ति में डूब जाने को कहती है। वह कहती हैं कि कुसंगति छोड़ कर अच्छे की संगति करो। कृष्ण की भक्ति में डूब जाओ।






अभ्यास-माला



बोध एवं विचार (क)पूर्ण वाक्य में उत्तर दो

1. ताहि के रंग में भीजै' - यहँ ताहि' शब्द का अर्थ क्या है ? 
उत्तर : 'ताहि' शब्द का अर्थ गिरिधर (गिरधर नागर)।

1. हां या नहीं में उत्तर दो

(क) हिन्दी की कृष्ण भक्ति काव्य धारा में मीराबाई का स्थान सर्वोपरि है। 
उत्तर- हां। 

(ख) कवयित्री मीराँबाई भगवान कृष्ण की अनन्य आराधिका थी। 
उत्तर- हां।

(ग) राजपूतों की तत्कालीन परंपरा का विरोध करती हुई क्रांतिकारिणी मीराँ सती नहीं हुई।
उत्तर - हां।

(घ) मीराँबाई अपने को भगवान कृष्ण की चरणों में पूर्णतः समर्पित नहीं कर पाई थी।
उत्तर- नहीं।

(ङ) मीराँबाई भगवान कृष्ण को अपने घर आने का आमंत्रण दिया है। 
उत्तर- हां।


2. सपूर्ण वाक्य में उत्तर दो :



(क) कवयित्री मीराँबाई का जन्म कहाँ हुआ था? 
उत्तर- कवयित्री मीराँबाई का जन्म मेड़ता प्रांत के कुड़की नामक स्थान में हुआ था।

(ख) भक्त कवयित्री मीराँबाई को कौन-सी आख्या मिली है? 
उत्तर- भक्त कवयित्री मीराँबाई को श्रीकृष्ण प्रेम-दिवानी की आख्या मिली है। 

(ग) मीराँबाई के कृष्ण भक्तिपरक फुटकर पद किस नाम से प्रसिद्ध है ? 
उत्तर : मीराँबाई के कृष्ण भक्तिपद फुटकर पद मीराँबाई के पदावली नाम से प्रसिद्ध है।

(घ) मीराँबाई के पिता कौन थे?
उत्तर : मीराँबाई के पिता का नाम राव रत्न सिंह था। 

(ङ) कवयित्री मीराँबाई ने मनुष्यों से किस नाम का रस पीने का आह्वान किया है? [HSLC-2014]
उत्तर : कवयित्री मीराँबाई ने मनुष्यों से रामनाम का रस पीने का आह्वान किया है। 






3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में) 



(क) मीराँ-भजनों की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।
उत्तर : मीराँ के भजनों में कृष्ण भक्ति के साथ-साथ गयात्मकता भी है। ये पद अनूठे हैं। इनकी लोकप्रियता का यही कारण है।

(ख) मीराँ का बचपन किस प्रकार बीता था?
उत्तर : मीराँ की माता का निधन बचपन में ही हो गया था। पिता हमेशा युद्ध में व्यस्त रहते थे। अत: मीराँ का पालन-पोषण उनकी दादा जी के द्वारा हुआ था। 

(ग) मीराँबाई का देहावसान किस प्रकार हुआ था?
उत्तर : यह बात प्रसिद्ध है कि मीराँबाई द्वारिकानाथ में रहने लगी थी। 1546 ई. में भजन गाते हुए मीराबाई श्रीकृष्ण की मूर्ति में सदा के लिए समा गई थी।

(घ) कवयित्री मीराँबाई की काव्य भाषा पर प्रकाश डालो।
उत्तर : मीराँ की काव्य भाषा मुख्यतः हिन्दी की उपभाषा राजस्थानी है। पर इसमें गुजराती, पंजाबी, खड़ी बोली के शब्द भी मिलते हैं। 






4. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में):



(क) प्रभु कृष्ण के चरण-कमलों में अपने को न्योछावर करने वाली मीराँबाई ने अपने आराध्य से क्या-क्या निवेदन किया है ?
उत्तर : मीराँबाई ने अपनी आराध्य भगवान कृष्ण से यह निवेदन किया है कि उन्होंने स्वयं को पूर्ण रूप से भगवान कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया है। अब कृष्ण शीघ्र आकर उन्हें दर्शन दें। मीराँ कृष्ण के विरह में पान के पके पत्ते की तरह पोली पड़ गई है।

(ख) सुन्दर श्याम को अपने घर आने का निमंत्रण देते हुए कवयित्री उनसे क्या-क्या कहा है? [HSLC-2014] अथवा, अपने घर आने का आमंत्रण देकर मीराँवाई श्याम से क्या कहती है? [HSLC-2018]
उत्तर : सुन्दर श्याम को अपने घर आने का निमंत्रण देते हुए मीराँबाई ने कहा कि सुन्दर श्याम आप हमारे घर आए। तुम्हारे आए बिना मैं सुखी नहीं होऊंगी। तुम्हारे विरह में मैं पके पान के पत्ते की तरह पीली पड़ गई हूं। मुझे तुझ पर ही आशा है, विश्वास है।

(ग) मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) रामनाम का रस पीने का आह्वान करते हुए मीराँबाई ने उन्हें क्या उपदेश दिया है ? अथवा, राम नाम के रस पीने के लिए मीराबाई ने क्या कहा है ? [HSLC-2020]
उत्तर : लोगों को रामनाम का रस पीने का उपदेश देते हुए मीराँबाई कहती है कि हे मनुष्य तुम रामनाम का रस पी लो। कुसंगति का त्याग कर सत्संगति में बैठ कर रामनाम की चर्चा करो। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह को अपने मन से निकाल दो। प्रभु कृष्ण के रंग में रंग जाओ।



5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में)



(क) मीराँबाई के जीवन वृत्त पर प्रकाश डालो।
उत्तर : हिन्दी के कृष्ण भक्त कवियों मीराँबाई का स्थान अन्यतम है। इनका जन्म सन 1498 ई. में राजपूताना के मेड़ता प्रांत के कुड़की नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम राव रत्न सिंह था। 

मीराँबाई की माता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। पिता हमेशा युद्ध में व्यस्त रहते थे। अतः इनका पालन-पोषण इनके दादा जी की देख रेख में हुई। इन्हीं से इन्हें कृष्णभक्ति की शिक्षा मिली। उम्र बढ़ने के साथ साथ इनकी कृष्णभक्ति भी बढ़ती गई। 

सन् 1516 ई. में मीराँबाई का विवाह राणा सांगा के जेष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ। दुर्भाग्यवश विवाह के सात वर्ष बाद ही.भोजराज की मृत्यु हो गई। क्रांतिकारिणी मीराँ ने पति के साथ सति होने से मना कर दिया। ये कृष्ण की भक्ति में लीन हो गई। 

सन् 1546 ई. में प्रभु कृष्ण के भजनकीर्तन करते करते रणछोड़ जी के मंदिर में सदा के लिए भगवान की मूर्ती में समा गई। 

(ख) पठित पाठ के आधार पर मीराँबाई की भक्ति भावना का निरूपण करो। अथवा, मीराबाई संसार के लोगों को क्या सलाह देती है ? (पद संख्या तीन के आधार पर उत्तर दो)। [HSLC-2015] अथवा, मीराँबाई ने मनुस्य को क्या उपदेश दिया है। [HSLC-2017] अथवा, "मीराबाई ने 'ताहि के रंग में भीजै' के जरिए क्या उपदेश दिया है? [HSLC-2019]
उत्तर : मीराँबाई भगवान कृष्ण की अनन्य उपासिका थीं। इनके सारे पद कृष्णभक्ति से सराबोर है। ये भगवान कृष्ण को ही अपना प्रियतम मानती थीं। कृष्ण की भक्ति में डूब कर मीराँबाई कहती है कि वे तो भगवान कृष्ण के शरण में आ गई हैं। 

पहले तो कोई नहीं जानता था। अब तो सभी जान गए हैं । भगवान कृष्ण तत्काल उनकी सुध लें। मीराँबाई भगवान कृष्ण से कहती हैं वे शीघ्र उनके घर आएं । उनके दर्शन के बिना पान के पके पत्ते की समान पीली पड़ गई है। 

इस प्रकार से मीराँ कृष्णमय हो गई है। उनकी भक्ति में वे आकंठ डूब गई है। इतना ही नहीं, मीराँ तो मनुष्य मात्र को कृष्ण की भक्ति करने का उपदेश देती हैं। 

(ग) कवयित्री मीराँबाई का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो।
उत्तर : हिंदी के कृष्णभक्त कवियों में मीराँ सर्वश्रेष्ठ हैं। हिंदी साहित्य में मीराँ को कृष्ण प्रेम दिवानी कहा गया है। मीराँ के पद हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इन पदों में भक्ति भावना के साथ-साथ और भी कई काव्यगत विशेषताएं हैं। 


6. सप्रसंग व्याख्या करो:



(क) “मैं तो चरण लागी...... चरण कमल बलिहार।" [HSLC-2016] 
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के कवयित्री मीराँबाईजी द्वारा रचित 'पद त्रय' से ली गई है।

सन्दर्भ : कवयित्री मीराँबाई ने इसमें भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धा-भक्ति व्यक्त की गई है।

व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री मीराबाँईजी ने कहती हैं कि मैं तो भगवान कृष्ण की शरण में आ गई हूँ। पहले तो इस बात को कोई नहीं जानता था, लेकिन अब तो सारा संसार जान गया है। हे भगवान आप कृपा करके दर्शन दें। हमारी सुध लीजिए। हे भगवान मैं तो आप के चरणों पर न्यौछावर हो गई है। यानी कि मैं आप की शरण में आ गई हूँ।

(ख) "म्हारे घर आवौ...... राखो जी मेरो माण।" [HSLC-2016]
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के कवयित्री मीराँबाईजी द्वारा रचित पद त्रय से ली गई है। 

सन्दर्भ : कवयित्री मीराबाई ने इस में भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धा-भक्ति व्यक्त की गई है।

व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों में मीराँबाईजी ने कहती है कि हे भगवान कृष्ण आप मेरे घर आएं। जब तक आप मेरे घर नहीं आएंगे तब तक मुझे चैन नहीं आएगा। आप के वियोग में मैं पके आम के पत्ते के समान पीली पड़ गई हूं। आप ही मेरे स्वामी हैं। मैं तो आप ही का ध्यान लगाए रहती हूं। हे भगवान कृष्ण आप मुझे शीघ्र दर्शन दें और मेरी लाज रख लें।

(ग)"राम नाम रस पीजै..... रंग में भीजै।
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के कवयित्री मीराँबाईजी द्वारा रचित पद त्रय से ली गई है। 

सन्दर्भ :कवयित्री मीराँबाई ने इसमें भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धाभक्ति व्यक्त की गई है।

व्याख्याः प्रस्तुत पंक्तियों में मीराँबाईजी ने कहती है कि हे मावन आप सब भगवान कृष्ण की भक्ति में डूब जाओ। कुसंग को त्याग सत्संग में बैठे और भगवान कृष्ण की कथा सुन लें। काम, क्रोध, मद, लोभ को मन से निकाल दें। मीराँ के प्रभु कृष्ण की भक्ति में सब डूब जाएँ।




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