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साखी/ पाठ ७/ क्लॉस १० नोट्स

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साखी/ पाठ ७/ क्लॉस १० नोट्स






पाठ-७
साखी




कबीरदास


कवि परिचय 



कवियों में संत कबीरदास जी अग्रणी स्थान के अधिकारी हैं। आपकी कविताओं में व्यापक मानवतावादी दृष्टि निहित है। इसलिए आपकी कविताएं तब भी लोकप्रिय थीं, आज भी लोकप्रिय हैं और आगे भी लोगप्रिय बनी रहेंगी।
महात्मा कबीरदास के जीवन से संबंधित अनेक जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। 

कहा जाता है कि सन् 1398 में काशी में आपका जन्म हुआ था। स्वामी रामानन्द के आशीर्वाद से एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से जन्मादिव्य बालक नीरु और नीमा नामक जुलाहे दम्पत्ति को लहरतारा नाम स्थान में मिला। उस मुसलमान जुलाहे दम्पति ने दिव्य बालक का 'कबीर' रखा और उसे पाल-पोस कर बड़ा किया। 

बड़े होकर कबीर जुलाहे का काम करने लगे। एक सौ बीस साल का पवित्र जीवन बीताने के बाद सन् 1518 में मगहर में आपका देहावसान हुआ। स्वामी रामानन्द के शिष्य कबीरदास जी निर्गुण-निराकार 'राम' की आराधना करते थे। संसार के रोमरोम में रहनेवाले राम आपके उपास्य रहे। काम करते-करते वे आराध्य के गीत गाया करते थे। 

घूमते-फिरते वे लोगों को तरह-तरह के उपदेश देते परवर्ती समय में शिष्यों ने उनकी वाणियों को लिखित रूप महात्मा कबीर की रचनाएं बीजक नाम से प्रसिद्ध हुई। बीजक के तीन भाग हैं- साखी, सबद और रमैनी। कबीर-काव्य की भाषा वस्तुतः तत्कालीन हिन्दुस्तानी है। उसे विद्वानों ने 'सधुक्क ड़ी', 'पंचमेल खिचड़ी' आदि कहा है, उनकी रचनाओं में सुबोध रूप में व्यक्त हुए हैं।



कविता का सारांश



1. ईश्वर का निवास तो मनुष्य की आत्मा में होता है। जैसे कि फूल का सुगंध फूल के अंदर होता है, लेकिन मनुष्य ईश्वर को बाहर खोजता फिरता है। जैसे कि कस्तूरी का मृग कस्तुरी की खोज में पूरे जंगल में भटकता रहता है।

2. सत गुरु की महिमा अनंत होती है। वे अपने शिष्यों पर अनंत उपकार करते हैं। वे हमारी बंद आँखों को खोल देते हैं और ईश्वर के दर्शन करा देते हैं।

3. गुरु कुम्हार के समान और शिष्य कुंभ के समान होता है। वे शिष्य की त्रुटि को खोज-खोज़ कर निकालते हैं। वे शिष्य की ताड़ना उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार एक कुम्हार कच्चे घड़े को सीधा करने के लिए नीचे से हाथ का सहारा देता है और ऊपर से चोट करता है।

4. बड़े-बड़े ग्रंथों को पढ़कर इस संसार में बहुत से लोग मर गए, लेकिन ज्ञानी कोई नहीं बन सके। ज्ञानी वही बने जिन् प्रेम के ढाई अक्षर को पढ़ लिया। 

5. ईश्वर के नाम का माला फेरते-फेरते बहुत समय बीत गया, लेकिन तुम्हारे मन की बुराई नहीं मिली। अब तुम हाथ का माला फेरना छोड़कर मन को बुराई की ओर से फेर लो।

6. साधु से उसकी जाति मत पूछो, उसके ज्ञान के बारे में पूछो । म्यान की बात छोड़ दो। तलवार की कीमत लगाओ।

7. मैं जब बुरे की खोज में निकला तब मुझे बुरा कोई नहीं मिला। जब मैंने अपनेल मन को देखा तब उसके अधिक बुरा कोई नहीं निकला।

8. जिसने गहरे पानी में डूबकी लगा कर खोजा, मोती उसे ही मिला । जो डूबने से डर गया, किनारे पर ही बैठा रह गया। 

9. जिस मनुष्य की आत्मा में प्रेम का संचार नहीं होता है, वह श्मशान या मुर्दे के समान होता है। वह आदमी साँस तो लेता है, मगर लोहार का भाथी की तरह। 

10. कल जिस काम को करना है, उसे आज ही कर लो। आज जिस काम को करना है, उसे अभी ही कर लो। क्या पता मौत कब आ जाएगी । यदि मौत आ जाएगी तब मन की सोची बात मन में ही रह जाएगी।






अभ्यास-माला



बोध एवं विचार 1. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो 


(क) महात्मा कबीर दास का जन्म कब हुआ था ? 
उत्तर : सन् 1398 में महात्मा कबीर दास का जन्म हुआ था। 

(ख) संत कबीर दास के गुरु कौन थे? [HSLC-2013] 
उत्तर : संत कबीर दास के गुरु थे रामानंद जी। 

(ग) कस्तूरी मृग वन-वन में क्या खोजता फिरता है ? [HSLC-2015] 
उत्तर : कस्तूरी मृग वन-वन में कस्तूरी नामक सुगंधित खोजता फिरता है। 

(घ) कबीर दास के अनुसार पंडित कौन है? [HSLC-2019] 
उत्तर : कबीर दास के अनुसार "जो प्रेम का ढाई आखर'' पढ़ता है वह पंडित हैं। 

(ङ) कवि के अनुसार हमें कल का काम कब करना चाहिए ? [HSLC-2016] 
उत्तर : कवि के अनुसार हमें कल का काम आज करना चाहिए। 

(च) कबीर के अनुसार गुरु कुम्हार है तो शिष्य क्या है ? [HSLC- '20] 
उत्तर : कबीर के अनुसार गुरु कुम्हार है तो शिष्य कुम्भ हैं। 


2. एक शब्द में उत्तर दोः



(क) श्रीमंत शंकरदेव ने अपने किस ग्रंथ में कबीरदास जी का उल्लेख किया है? 
उत्तर : कीर्तन घोषा।

(ख) महात्मा कबीरदास का देहांत कब हुआ था? 
उत्तर : सन् 1518 में। 

(ग) कबीरदास के अनुसार प्रेमहीन शरीर कैसा होता है ? [HSLC-2015] 
उत्तर : श्मशान की तरह। 

(घ) कबीरदास जी ने गुरु को क्या कहा है? 
उत्तर : कुम्हार।

(ङ) महात्मा कबीरदास की रचनाएँ किस नाम से प्रसिद्ध है?
उत्तर : बीजक। 






3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:



(क) कबीरदास के पालक पिता-माता कौन थे? 
उत्तर : नीरू और नीमा कबीरदास के पालक पिता-माता थे। 

(ख) कबीर शब्द का अर्थ क्या है? 
उत्तर : कबीर शब्द का अर्थ है बड़ा, महान, श्रेष्ठ। 

(ग) साधु की कौन सी बात नहीं पूछनी चाहिए? [HSLC-2016] 
उत्तर : साधु से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए। 

(घ) साखी शब्द किस संस्कृत शब्द से विकसित है? [HSLC-2017, '20] 
उत्तर : साखी शब्द संस्कृत के "साक्षी' शब्द से विकसित है। 

(ङ) डूबने से डरने वाला व्यक्ति कहाँ बैठा रहता है? [HSLC-2018] 
उत्तर : डूबने से डरने वाला व्यक्ति किनारे पर बैठा रहता है। 

(च) कबीरदास ने किस भाषा में कविता लिखी थी? [HSLC-2019] 
उत्तर : कबीर की भाषा कबीर-काव्य की भाषा वस्तुतः तत्कालीन हिन्दुस्तानी है। 

(छ) कबीरदास के अनुसार साधु की पहचान क्या है ? (HSLC 2017) 
उत्तर : कबीरदास के अनुसार ज्ञान का भंडार ही साधु की पहचान है। 

(ज) कबीरदास ने किस भाषा में कविता लिखी थी? [HSLC-2019]
उत्तर: कबीरदास ने तत्कालीन हिंदुस्तानी भाषा में कविता लिखी ती। 



4. अति संक्षिप्त उत्तर दें ( 25 शब्दों में):




(क) कबीरदास की कविताओं की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।
उत्तर : कबीरदास जी ने जनता के बीच रहकर जनता की भाषा में कविता की। इनकी कविताओं में भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान और मानवतावादी दृष्टि भी है। इसीलिए इनकी कविताएं लोकप्रिय हुईं। 

(ख) कबीरदास जी के आराध्य कौन थे?
उत्तर : कबीरदास जी के आराध्य सर्वव्यापी निराकर परमेश्वर राम थे।

(ग) कबीरदास जी की काव्य भाषा किन गुणों से युक्त है? 
उत्तर : कबीरदास की काव्य भाषा तत्कालीन हिंदुस्तानी था। इसमें हिंदी, उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, फारसी आदि के शब्द मिले थे। विद्वानों ने इसे सधुक्कड़ी भाषा कहा है।

(घ) तेरा साईं तुझ में, ज्यों पुहुपन में' बास का आशय क्या है? 
उत्तर : इसका आशय यह है कि जिस प्रकार फूल के अंदर ही उसकी खुशबू रहती है, बाहर नहीं। उसी प्रकार ईश्वर का निवास हर व्यक्ति की आत्मा में होता है, बाहर नहीं।

(ङ) सत् गुरु की महिमा के बारे में कबीरदास ने क्या कहा है? 
उत्तर : सत् गुरु की महिमा के बारे में कबीरदास जी ने यह कहा है कि सत् गुरु अपने शिष्यों पर अनंत कृपा करते हैं। वे उनका ज्ञान चक्षु खोलकर उन्हें ईश्वर के दर्शन करा देते हैं।

(च) अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट' का तात्पर्य बताओ। 
उत्तर : इसका तात्पर्य यह है कि गुरु कुम्हार के समान होते हैं। कुम्हार जिस प्रकार से कच्चे घड़े का खोट खोज-खोज कर निकालता है और भीतर से सहारा देकर ऊपर से चोट करके उस खोट को दूर करता है, उसी प्रकार गुरु अंतर मन से अपने शिष्य से स्नेह करते हैं, लेकिन उसकी कमियों को दूर करने के लिए ऊपर मन से उस पर शासन करते हैं।





5. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में)



(क) बुराई खोजने के संदर्भ में कवि ने क्या कहा है?
उत्तर : बुराई खोजने के संदर्भ में कवि ने कहा है कि जब मैं बुरा व्यक्ति खोजने चला तब मुझे बुरा कोई नहीं मिला। जब मैंने अपने अंदर झाँका तब मुझ सा बुरा कोई नहीं मिला।

(ख) कबीरदास जी ने किस लिए मन का मनका फेरने का उपदेश दिया है? 
उत्तर : कबीरदास जी ने मन का मनका फेरने का उपदेश इसलिए दिया है कि क्योंकि हाथ का मनका बहुत दिनों तक फेरने से भी मन की बुराई नहीं गई। अतः अब मन को बुराई की ओर से फेरने की बात कही है।

(ग) गुरु शिष्य को किस प्रकार गढ़ते हैं ? [HSLC- 2016] 
उत्तर : कुम्हार जिस तरह घड़े को गढ़ता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्य को गढ़ते हैं। अंदर से तो स्नेह करते हैं लेकिन उसकी बुराई दूर करने के लिए ऊपर से उस पर कठोर शासन करते हैं।

(घ) कोरे पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता पर कबीरदास जी ने किस प्रकार डाला है?
उत्तर : कोरे पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता पर कबीरदास जी ने इस प्रकार प्रकाश डाला है कि शास्त्र पढ़-पढ़ कर बहुत से लोग विद्वान बन गए, लेकिन ज्ञानी कोई नहीं बन सका। जिसने ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ लिया वही पंडित बन गया। 


6. सम्यक उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में)



(क) संत कबीरदास की जीवन-गाथा पर प्रकाश डालो। 
उत्तर : संत कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. में और मृत्यु 1518 ई. में हुई थी। इनका जन्म वाराणसी में और मृत्यु मगहर में हुई थी। 

कहा जाता है कि जन्म के तुरंत बाद ही इनकी माता ने इन्हें लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। नीरू और नीमा नामक एक जुलाहे दंपत्ति ने इनको पाल-पोषकर बड़ा किया था। 

बड़े होकर ये भी जुलाहे का काम करने लगे थे। साथ ही साथ कविता बनाकर शिष्यों को शिक्षा भी देने लगे थे। इनके गुरु का नाम स्वामी रामानंद था। इनकी पत्नी का नाम लोई था। कमाल और कमाली इनके पुत्र-पुत्री थे। 

कबीरदास की मृत्यु के बाद इनके शिष्यों ने इनके उपदेशों को पुस्तक का रूप दिया, जो बीजक के नाम से प्रसिद्ध है।

(ख) भक्त कवि कबीरदास जी का साहित्यिक परिचय दो। 
उत्तर : हिंदी साहित्य के ज्ञानमार्गी भक्त कवियों में कबीरदास जी का स्थान सर्वोच्च है। इन्होंने आम जनता के बीच रह कर आम जनता की भाषा में आम जनता के लिए कविता की थी। 

इनकी कविता में भक्ति भाव के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान और मानवतावादी दृष्टिकोण भी पाया जाता है। इसीलिए इनकी कविताएँ आज भी प्रासांगिक हैं। 

ये अपने समय के लोकप्रिय और क्रांतिकारी कवि थे। ये पढे लिखे नहीं थे, लेकिन सांसारिक अनुभवीं से काफी ज्ञान प्राप्त किया था। 

इनकी मृत्यु के बाद इनके शिष्यों ने इनकी कविताओं को पुस्तक रूप दिया, जिसे बीजक कहा जाता है। इनके तीन भाग हैं- साखी, शबद और रमैनी। इनकी भाषा को पचमेल, सधुक्कड़ी या खिचड़ी कहा जाता है। इसमें हिंदी, उर्दू, फारसी, राजस्थानी, पंजाबी के शब्द मिले हैं।



7.सप्रसंग व्याख्या करो :



(क) जाति न पूछो साधु की...... पड़ा रहन दो म्यान। [HSLC-2019] 
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग 2 के कबीरदासजी द्वारा रचित 'साखी' शीर्षक कविता से ली गई है।

सन्दर्भ : कवि ने इसमें साधु की जाति नहीं, ज्ञान पूछने की बात कही है। 

व्याख्या : कवि कहते हैं कि जिस प्रकार हम म्यान की नहीं तलवार की कीमत लगाते हैं, उसी प्रकार हमें साधुओं की जाति नहीं, ज्ञान के बारे में पूछना चाहिए। असली चीज तो ज्ञान होता है, जाति नहीं।

(ख) जिन ढूँढा तिन पाइयाँ रहा किनारे बैठ। [HSLC-2015] 
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग 2 के करीबदासजी द्वारा रचित 'साखी' शीर्षक कविता से ली गई है।

सन्दर्भ : कबीरदास जी ने इसमें परिश्रम के महत्त्व को बताया है।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जो गहरे पानी में डुबकी लगा कर खोजता है, मोती उसी को मिलता है। उसे मोती कहाँ से मिलेगा जो डूबने के डर से किनारे पर बैठा रहता है। यानी कि परिश्रम करने वाले को ही जीवन में सफलता मिलती है।

(ग) जा घट प्रेम न संचरै ........ साँस लेत बिनु प्राण। [HSLC-2015,19] 
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग 2 के कबीरदासजी द्वारा रचित 'साखी' शीर्षक कविता से ली गई है। 

सन्दर्भ : कवि ने इसमें प्रेम के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता है, वह व्यक्ति श्मशान के समान होता है। वह साँस तो लेता है, लेकिन उसी प्रकार जिस प्रकार की लोहार की भाथी एक जड़ पदार्थ होकर भी साँस लेता है। 

(घ) काल करे सो ....... बहुरि करेगो कब। [HSLC-2017]
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग 2 के करीबदासजी द्वारा रचित 'साखी' शीर्षक कविता से ली गई है।

सन्दर्भ : कबीरदास जी ने यहाँ पर समय की महत्ता पर प्रकाश डाला है। 

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हमें जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए। आज जो करना है उसे अभी कर लेना चाहिए। मौत का कोई पता नहीं कब आ जाए। मौत आ जाने से मन की सोची बात मन में ही रह जाती है।





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