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सड़क की बात/ पाठ ४/ क्लॉस १० नोट्स

इस आर्टिकल पर आपको पाठ–४ सड़क की बात क्लॉस १० नोट्स मिलेंगे। बीच मैं क्लॉस १० रिलेटेड आर्टिकल भी मिलेंगे। 


सड़क की बात/ पाठ ४/ क्लॉस १० नोट्स








पाठ–४
सड़क की बात






रवीन्द्रनाथ ठाकुर



लेखक परिचय



'विश्व-कवि' की आख्या से विभूषित गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर उन प्रातः स्मरणीय मनीषियों की परंपरा में आते हैं, जिन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अपने समग्र रूप में चित्रित किया। आपने अपनी रचनाओं में न सिर्फ भारत की गौरवमयी सभ्यता-संस्कृति को अभिव्यक्ति दी, बल्कि विश्व मानवतावादी दृष्टि से पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के उज्ज्वल तत्वों को अपनाने का आह्वान भी. किया। 

आप मूलतः बांग्ला के कवि-कलाकार थे, परन्तु अपनी उदारवादी मानवतावादी दृष्टि के कारण आपने क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता का, फिर राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीयता एवं विश्वबंधुत्वं का स्पर्श किया। इस प्रकार वे पहले बंगाल के, फिर भारतवर्ष के और फिर संपूर्ण विश्व के चहेते बने।

कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, सन् 1861 ई. को कोलकाता के जोरासाँको में एक संपन्न एवं प्रतिष्ठित बांग्ला परिवार में हुआ था। आपके पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर जी दार्शनिक प्रवृत्ति के प्रख्यात समाज-सुधारक थे। रवींद्रनाथ ठाकुर की शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः घर पर ही हुई। काव्य, संगीत, चित्रकला, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक सुधार एवं राजनीतिक सुरुचि का वातावरण उन्हें परंपरा और परिवार से मिला। 

उन्होंने प्रकृति एवं जीवन की खुली पुस्तक को लगन के साथ पढ़ा। स्वाध्याय के बल पर आपने विविध विषयों का विपुल ज्ञान प्राप्त कर लिया। सत्रह वर्ष की अवस्था में आप इंग्लैंड गए। वहाँ आपको कई सुप्रतिष्ठित अंग्रेज कवि-साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे पश्चिमी विचारधारा के आलोक से दीप्त होकर स्वदेश वापस आए। काव्य प्रतिभा के धनी रवींद्रनाथ ठाकुर ने सात वर्ष की कोमल अवस्था में ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था। 

तब से लेकर देहावसान के समय तक आपकी अमर लेखनी बराबर चलती रही। आपने कई हजार कविताओं, गीतों, कहानियों, रूपकों (भावनाट्य) एवं निबंधों की रचना की। आपने उपन्यास भी लिखे, जिनमें 'गोरा' और 'घरे बाइरे' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आपके द्वारा रचित कहानियों में से 'काबुलीवाला' एक कालजयी कहानी है। कवि-शिरोमणि रवींद्रनाथ ठाकुर की कीर्ति का आधार-स्तंभ है उनका काव्य-ग्रंथ 'गीतांजलि', जिस पर आपको सन् 1913 ई. में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। 

आपकी अन्य रचनाओं में 'मानसी', 'संध्या-संगीत', 'नैवेद्य', 'बलाका', 'क्षणिका' आदि अन्यतम हैं। आपके द्वारा विरचित सैकड़ों गीतों से रवींद्र-संगीत नामक एक निराली संगीतधारा ही बह निकली है। आपके द्वारा रचित 'जन गण मन....' भारतवर्ष का राष्ट्रीय संगीत है, तो आपकी ही रचना 'आमार सोणार बांग्ला' पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश का राष्ट्रीय संगीत है।

कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में बोलपुर के निकट 'शांतिनिकेतन' नाम के एक शैक्षिक-सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की थी। यह केन्द्र गुरुदेव के सपनों का मूर्त रूप रहा और आगे यह विश्व-भारती विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आपने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी रुचि ली थी। शांतिनिकेतन में आने पर मोहनदास करमचंद गाँधी को आपने 'महात्मा' के रूप में संबोधित किया था। 

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के पक्ष में अपना मत देते हुए गुरुदेव ने कहा था"उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए जो देश के सबसे बड़े हिस्से में बोली जाती हो, अर्थात् हिन्दी।'' 7 अगस्त, सन् 1941 ई. को इस महान पुण्यात्मा का स्वर्गवास हुआ।


पाठ का सारांश



सड़क की बात शीर्षक निबंध में लेखक सड़क की आत्मकथा की शैली में सड़क की आपबीती और उसके तरह तरह के अनुभवों को बताते हैं। लेखक ने यहां पर सड़क को एक जड़ पदार्थ नहीं बल्कि एक चेतन प्राणी के रूप में प्रस्तुत किया है। 

सड़क कहती है कि वह चिरदिन से अभिशप्त होकर जंगलों, पहाड़ों, मैदानों में मौन एक करवट लेटी है। उसको बोलने तक का अधिकार नहीं है। सड़क बोल नहीं सकती लेकिन अनुभव कर सकती है। दुखी-सुखी लोग सड़क पर चलते हैं। सड़क इनके पदचाप से, इनकी बातचीत से अनुभव कर लेती है कि इस पर से गुजरने वाला कौन व्यक्ति दुखी है कौन सुखी है। 

सड़क अपने ऊपर चलने वाले लोगों की बहुत सी कहानियां सुनती है। लेकिन वह कोई भी कहानी पूरी नहीं सुन पाती है। क्योंकि कहानी पूरी होने से पहले ही लोग सड़क छोड़ देते हैं। सड़क किसी की मंजिल नहीं है, केवल मंजिल तक पहुंचने का साधन मात्र है। लोग सड़क को कोसते हैं। उसे गालियां देते हैं। 

लेकिन सड़क सब सुनकर, सहन करके लोगों को उसके घर तक पहुंचा देती है। सड़क अपने ऊपर चलने वाले सभी को पहचानती है। आखिर सड़क किस किस को याद रखे? सड़क धूप, वर्षा सब कुछ सहन करती हुई लेटी रहती है।







পাঠৰ সাৰাংশ



“সড়ক কী বাত” শীর্ষক নিবন্ধটোত লেখকে বাটৰ আত্মকথা আৰু অনুভৱঅভিজ্ঞতাৰ বিষয়ে সুন্দৰভাৱে বৰ্ণনা কৰিছে। লেখকে এই নিবন্ধটোত বাটক এটি নির্জীৱ প্রাণীনকৈ এক সজীৱ প্ৰাণীৰ ৰূপত বর্ণনা কৰিছে। 

বাটে আত্মকথা শৈলীত এইদৰে কৈছে যে চিৰদিন অভিশপ্ত হৈপাহাৰে-ভৈয়ামে, বনে-জংগলে, দেশ-দেশান্তৰে বিয়পি মৌন হৈ শুই আছে। ইয়াৰ কিবা কোৱাটো যেন অধিকাৰ নাই। বাটে ক’বলৈ নােৱাৰে কিন্তু সি সকলাে অনুভৱ কৰিব পাৰে। ধনী-দুখীয়া সকলােৱে বাটত খােজ কাঢ়ে। 

এই সকলৰ খােজ, কথা বৰাৰ পৰা অনুভৱ কৰি লয় যে পথেৰে যােৱা কোনজন সুখী আৰু কোনজন দুখী। বাটে নিজৰ ওপৰত খােজ কঢ়া সকলাে মানুহৰ অনেক কথাই শুনে। কিন্তু ই কোনাে কথাই সম্পূৰ্ণৰূপে শুনি পােৱা নাই। কাৰণ কথা শেষ হােৱাৰ আগতে পথিকে পথ এৰি গুচি যায়। 

বাট কাৰাে লক্ষ্য নহয়, ই কেৱল লক্ষ্যলৈ যােৱাৰ মাধ্যমহে। মানুহে বাটক গালিশপনি পাৰে। কিন্তু বাটে এইসকলাে শুনি, সহ্য কৰি মানুহক নিজৰ ঘৰলৈ আগুৱাই দিয়ে।বাটটোৱে নিজৰ ওপৰেদি খােজ কঢ়া সকলাে মানুহকে চিনি পায়। এনে বাটে কাৰ কাৰ বিষয়ে মনত ৰাখিব। ৰ'দ, বৰষুণ সকলাে নেওচি শাশ্বতভাৱে শুই থাকে।


अभ्यास – माला


बोध एवं विचार

(क) पूर्ण वाक्य मे उत्तर दो

1. मैं बोल नहीं सकती, पर अंधे की तरह सब कुछ महसूस कर सकती हु।’ – यहा ‘मैं’ किसके लिए प्रयुक्त हैं।
उत्तर : सड़क के लिए।

2. सड़क की वात' पाठ के लेखक कौन है ? [HSLC-'19] 
उत्तर : सड़क की बात' पाठ का लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर है। 







1. एक शब्द में उत्तर दो



(क) गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर किस आख्या से विभूषित हैं?
उत्तर : विश्व-कवि।

(ख) रवींद्रनाथ ठाकुर जी के पिता का नाम क्या था?
उत्तर : देवेंद्रनाथ ठाकुर।

(ग) कौन-सा काव्य ग्रंथ रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कीर्ति का आधार स्तम्भ है? 
उत्तर : गीतांजलि।

(घ) सड़क किसकी आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही है? [HSLC-2016]
उत्तर : शाप की।

(ङ) सड़क किसकी तरह सब कुछ महसूस करती है?
उत्तर : अंधे की तरह।

(च) सड़क किसकी कोई भी कहानी पूरी नहीं सुन पाती ? [HSLC-2018] 
उत्तर : संसार की।



2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :




(क) कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुरेका जन्म कहा हुआ था?
उत्तर : कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म कोलकाता के जोरासांको में हुआ था। 

(ख) गुरुदेव ने कब मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' के रूप में संबोधित किया था?
उत्तर : शांतिनिकेतन में आने पर गुरुदेव ने मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' कह कर संबोधित किया था। 

(ग) सड़क के पास किस कार्य के लिए फुरसत नहीं है?
उत्तर : सड़क के पास फुरसत नहीं है कि वह अपने सिरहाने नीले रंग का एक वनफूल खिला सके।

(घ) सड़क ने अपनी निंद्रावस्था की तुलना किससे की है? 
उत्तर : सड़क ने अपनी निंद्रावस्था की तुलना अजगर से की है।

(ङ) सड़क अपनी सूखी और कड़ी सेज पर क्या नहीं डाल सकती ? 
उत्तर : सड़क अपनी सूखी और कड़ी सेज पर एक मुलायम दूब नहीं डाल सकती।
प्रयुक्त है? 

(च) मै अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती'। यहाँ मै' किसके लिए [HSLC 2017,20]
उत्तर: यहाँ 'मै' सड़क के लिए प्रयुक्त है।





3. अति संक्षिप्त उत्तर दो ( लगभग 25 शब्दों में ) 



(क) रवींद्रनाथ ठाकुर जी की प्रतिभा का परिचय किन क्षेत्रों में मिलता है ?
उत्तर : रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रतिभा का परिचय हमें कविता, कहानी, उपन्यास, चित्रकला, संस्कृति, शिक्षा आदि के क्षेत्र में मिलता है।

(ख) शांतिनिकेतन के महत्त्व पर प्रकाश डालो।
उत्तर : शांतिनिकेतन रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित एक शैक्षणिक और सांस्कृतिक केंद्र है। यह अब विश्वभारती नाम से विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। 

(ग) सड़क शाप मुक्ति की कामना क्यों करती हैं ?
उत्तर : सड़क किसी के शाप से स्थित, अविचल, जड़ निद्रा में होता है कि शायद किसी के शापवश सोई हुई है। अतः वह अब शाप मुक्ति की कामना करती है।

(घ) सुख की घर-गृहस्थी वाले व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क को क्या बोध होता है?
उत्तर : सुख की घर-गृहस्ती वाले व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क को यह अनुभव होता है कि वह हर कदम पर सुख की तस्वीर खींचता है। आशा के बीज बोता है।

(ङ) गृहहीन व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क को क्या अनुभव होता है ?
उत्तर : गृहहीन व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क को अनुभव होता है कि उसके कदमों में न आशा है न अर्थ है। उसके कदमों में न दाएँ है बाएँ है।

(च) सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण चिह्न को क्यों ज्यादा देर तक नहीं देख सकती ?
उत्तर : सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण चिह्न को ज्यादा देर नहीं देख सकती है क्योंकि उसके ऊपर लगातार चरण चिह्न पड़ते रहते हैं। नए पाँव आकर पुराने चरण चिह्नों को पोछ देते हैं।

(छ) बच्चों के कोमल पाँवों के स्पर्श से सड़क में कौन-से मनोभाव बनते हैं? [HSLC-2016] 
उत्तर : बच्चों के कोमल पाँवों के स्पर्श से सड़क में यह मनोभाव बनता है कि उसकी कठोरता बच्चों के पाँवों को लगती होगी। उस समय उसे कुसुम कली के समान कोमल होने की इच्छा होती है।

(ज) किसके लिए सड़क को नहँसी है,न रोना ? अथवा, "इसलिए सड़क के न हँसी, न रोना" इसके पीछे क्या-क्या कारण ही सकते हैं? [HSLC-2019]
उत्तर : अमीर-गरीब, जन्म-मृत्यु के लिए सड़क को न हँसी है न रोना। 

(झ) राहगीरों के पाँवों के शब्दों को याद रखने के संदर्भ में सड़क ने क्या कहा है?
उत्तर : राहगीरों के पाँवों के शब्दों को याद रखने के संदर्भ में सड़क ने कहा है कि कितनेल ही पाँवों के शब्द उस पर आकर नीरव हो गए हैं। वह उन्हें याद नहीं रख सकती। 


4. संक्षिप्त उत्तर दो ( लगभग 50 शब्दों में ) 



(क) जड़ निद्रा में पड़ी सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके बारे में क्या समझ जाती है ?
उत्तर : जड़ निद्रा में पड़ी सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके बारे में यह समझ जाती है कि कौन दुःखी व्यक्ति है, कौन सुखी व्यक्ति है, कौन श्मशान जा रहा है। कौन हँस रहा है, कौन रो रहा है, कौन काम करने जा रहा है, कौन आराम करने जा रहा है, आदि-अदि।

(ख) सड़क संसार की कोई भी कहानी पूरी क्यों नहीं सुन पाती ?
उत्तर : सड़क संसार की कोई भी कहानी पूरी नहीं सुन पाती है क्योंकि कोई भी व्यक्ति सड़क पर रुक कर अपनी पूरी कहानी नहीं सुनाता। लोग कहानी सुनातेसुनाते आगे बढ़ जाते हैं। उसकी जगह दूसरा व्यक्ति आ जाता है और उसकी कहानी शुरू हो जाती है।

(ग) 'मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सब का उपाय मात्र हूँ।'- सड़क ने ऐसा क्यों कहा है ? अथवा, 'मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सब का उपाय मात्र हूँ।'- इस कथन का आशय क्या है ? [HSLC-2015, '20] 
उत्तर : सड़क ने ऐसा इसलिए कहा कि क्योंकि कोई सड़क तक पहुँचने का लक्ष्य नहीं रखता, सड़क के सहारे अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। सड़क हर व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक ले जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय बनती है। अतएव प्रस्तुत अंश का आशय इस प्रकार है।

(घ) सड़क कब और कैसे घर का आनंद कभी-कभी महसूस करती है? [HSLC-2018]
उत्तर : सड़क घर का आनंद कभी-कभी तब महसूस करती है, जब छोटे बच्चे अपने घर से निकलकर सड़क को ही अपना घर बना लेते हैं। अपने घर का आनंद वे सड़क पर ले आते हैं। उनके पिता का आशीर्वाद और माँ का स्नेह घर से निकल कर सड़क पर आ जाता है।

(ङ) सड़क अपने ऊपर नियमित रुप से चलने वालों की प्रतीक्षा क्यों करती है? 
उत्तर : सड़क अपने ऊपर नियमित रुप से चलने वालों की प्रतीक्षा करती है क्योंकि वह उन्हें अच्छी तरह पहचानती है।


5. उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में )



(क) सड़क का कौन-सा मनोभाव तुम्हें सर्वाधिक हृदयस्पर्शी लगा और क्यों?
उत्तर : सड़क का वह मनोभाव मुझे सर्वाधिक हृदयस्पर्शी लगा जिसमें वह कहती है कि बच्चों अपने कोमल पैरों से जब उस पर चलते हैं तब सड़क को ऐसा लगता है, जैसे कि सड़क की कठोरता बच्चों के पैरों में लगती होगी। 

उस समय सड़क को लगता है कि वह कुसुम की कोमल कली बन जाए। सड़क का यह मनोभाव मुझे इसलिए अच्छा लगा क्योंकि इसमें सड़क ने बच्चों के प्रति अपनी गहरी संवेदी सहानुभूति दिखाई है।

(ख) सड़क ने अपने बारे में जो कुछ कहा है उसे अपने शब्दों में प्रस्तुत करो।
उत्तर : इस प्रश्न के उत्तर के लिए पाठ का सारांश देखें।

(ग) सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की जो बातें उजागर हुई हैं, उन पर संक्षिप्त प्रकाश डालो।
उत्तर : प्रस्तुत पाठ में लेखन ने सड़क की आत्मकथा के माध्यम से मानव की आत्मकथा प्रस्तुत की है। मानव का जीवन सड़क के जीवन के समान ही होता है। 

जिस प्रकार सड़क पर सुखी, दुखी, गरीब, अमीर, छोटे, बड़े सभी तरह के लोग चलते हैं, उसी प्रकार मानव का जीवन भी कई प्रकार का होता है। जिस प्रकार सड़क पर बहुत से लोग चलते हैं। 

वह किसी भी चरण चिह्न को अधिक देर तक याद नहीं रख सकती, उसी प्रकार एक मानव के जीवनकाल में बहुत से लोगों का मिलना-जुलना होता है। आखिर वह किसे कहाँ तक याद रखें । इसी प्रकार से मानव जीवन की बहुत सारी बातों को लेखक ने सड़क की आत्मकथा के माध्यम से उजागर किया है।


6. सप्रसंग व्याख्या करो



(क) अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों
को पढ़ लेती हूँ।'
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्ति हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के रवींद्रनाथ ठाकुरजी द्वारा रचितं 'सड़क की बात' शीषक पाठ से ली गई है। 

सन्दर्भ : लेखक ने इसमें सड़क जैसे उपयोगी जड़ पदार्थ को चेतन प्राणी के रूप में मानवीकरण करते हुए उसकी आत्मकथा प्रस्तुत की है।

व्याख्या : अपनी आत्मकथा कहते हुए सड़क प्रस्तुत पंक्ति में कहती है कि चिर निद्रा में पड़ी-पड़ी ही वह उस पर चलने वाले पाँवों की आहट से ही वह लोगों के दिल की धड़कनें उनकी भावनाएँ, अनुभूतियों, उनके मन की बातों, सुख-दुख का पता लगा लेती है। वह जान लेती है कि कौन सुखी है, कौन दुखी है।

(ख) मुझे दिन-रात यही संताप सताता रहता है कि मुझ पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता।'
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्ति हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के रवींद्रनाथ ठाकुरजी द्वारा रचित 'सड़क की बात' शीर्षक पाठ से ली गई है। 

सन्दर्भ : लेखक ने इसमे अति उपयोगी जड़ पदार्थ सड़क का मानवीकरण करके उसकी आत्मकथा प्रस्तुत की है।

व्याख्या : सड़क एक चेतन प्राणी की तरह अपनी आत्मकथा में व्यक्त करती है कि उसे इस बात का हमेशा दुख रहता है कि कोई उस पर इच्छा से नहीं बल्कि अनिच्छा से पैर रखता है। सभी उसे कोसते ही हैं। कोई उसे अपने घर तक पहुंचा देने के लिए धन्यवाद नहीं देता है।

(ग) मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँऔर पड़ी रहूँगी।'
उत्तर : प्रसंग : प्रस्तुत पंक्ति हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के रवींद्रनाथ ठाकुरजी द्वारा रचित 'सड़क की बात' शीर्षक पाठ से ले गई है। 

सन्दर्भ : लेखक ने इसमें एक अति उपयोगी जड़ पदार्थ सड़क का मानवीकरण करते हुए उसकी आत्मकथा प्रस्तुत की है।

व्याख्या : एक चेतन प्राणी की तरह अपनी आत्मकथा में सड़क कहती है कि वह न हँसी न ही रुदन को अपने ऊपर पड़े रहने देती है। भाव यह है कि सड़क पर न तो कोई सुखी आदमी ही ठहरता है और न तो कोई दुखी आदमी ही ठहरता है। सभी उस से गुजर जाते हैं। केवल सड़क की जड़ निद्रा में पड़ी रहती है।



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